
जन्मदिन मुबारक : पद्मश्री डॉ. योगेश प्रवीन
दुर्गा शर्मा
28 अक्टूबर 1938 को गौसनगर (रकाबगंज) में जन्मे पद्मश्री डॉ. योगेश प्रवीन को पिता जीपी श्रीवास्तव और मां रमा श्रीवास्तव के संस्कारों ने अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों से प्रेम करना सिखाया। यह प्रेम और समर्पण उनके मन में इतना गहरे से जुड़ा कि उन्हें अवध संदर्भ में इतिहासकार माना जाने लगा। हालांकि, डॉ. योगेश ने परास्नातक की उपाधि साहित्यिक हिंदी और संस्कृत विषय में प्राप्त की और विद्यांत कॉलेज के हिंदी विभाग में प्रवक्ता के पद से सेवानिवृत्त हुए। सिर्फ हिंदी नहीं अंग्रेजी, बांग्ला और उर्दू भाषा पर भी इनका अधिकार है। रकाबगंज की तंग गलियों में बनी पीली कोठी पंचवटी में डॉ. योगेश के रूप में शहर का चलता-फिरता विनम्र ज्ञानकोष रहता है। लखनऊ से मुहब्बत में वो कहते हैं- मैंने लखनऊ को नहीं, लखनऊ ने मुझे लिखा है। फिर एक शेर पढ़ते हैं…
हम फकीरों से जो चाहे दुआ ले जाए
फिर खुदा जाने किधर हमको हवा ले जाए।
इतिहास के झरोखे से झांकने के साथ ही कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, गीत गजल हर विधा को इनकी लेखनी ने लालित्य दिया। उनकी कविता लखनऊ की पहचान बन हर किसी की जुबान पर चढ़ गई…
लखनऊ है तो महज गुंबद ओ मीनार नहीं
सिर्फ एक शहर नहीं कूच ओ बाजार नहीं…।
डाॅ. योगेश प्रवीन बुधवार को अपने जन्मदिन के दिन से ही आत्मकथा लिखना शुरू करेंगे। वो कहते हैं, मैं आत्मकथा के लिए तैयार नहीं था, पर समय के साथ लोगों का आग्रह बढ़ता ही रहा और अब मैं मना नहीं कर सका। आत्मकथा सिर्फ मेरी कहानी नहीं, इसमें अवध की परंपराएं भी होंगी। इसमें लखनऊ भी धड़केगा। वो आगे कहते हैं, हमारे लखनऊ में हर तरफ से लोग आए, जो आए लखनऊ की मुहब्बत में आए। उन्होंने लखनऊ के लिए किया, फिर लखनऊ ने उनको गौरवांवित किया। यशपाल पंजाबी, अमृत लाल नागर गुजराती, शिवानी कुमाऊंनी, एपी सेन बंगाली, भातखंडे मराठी थे, लखनऊ में सबका अवदान है। लखनऊ में न पत्थर ना संगमरमर, लखौरी ईंट से इमामबाड़ा, रूमी दरवाजा, हुसैनाबाद आदि गुलजार हैं। सब मिट्टी का करिश्मा है। चिकन भी तो कच्चे सूत का कमाल है। लखनऊ वो जगह है, जिसने अदना को अजमत अता की है। डॉ. योगेश कहते हैं, मुझसे ज्यादा लखनऊ वालों को इसकी फिक्र होनी चाहिए कि हम नई पीढ़ी को क्या धरोहर दे जाएंगे। मेरी दिली तमन्ना है कि मैं अपने घर को संग्रहालय के रूप में देख सकूं। यहां लाइब्रेरी बने। तकनीक से भी जुड़े, ताकि युवा पीढ़ी अवध के हुस्न और हुनर को करीब से जान सके।
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अवध संदर्भ में 25 किताबें : लखनऊ नामा, दास्ताने अवध, जानेआलम रचित नाजो का रूपान्तर, ताजदारे अवध, गुलिस्ताने अवध, साहबेआलम, कंगन से कटार (ऐतिहासिक नाटक), डूबता अवध, मानोमेन्ट्स ऑफ लखनऊ (अंग्रेजी), हिस्ट्री ऑफ लखनऊ (अंग्रेजी), आपका लखनऊ, अवध के धरा अलंकरण, अवध में भित्ती चित्रांकन, लखनऊ की धरोहर, लक्ष्मणपुर की आत्मकथा, लखनऊ के मोहल्ले और उनकी शान, लखनऊ की शायरी जहान की जबान पर, अवध की बेगमें, रूलर्स ऑफ अवध (अंग्रेजी), लखनउवा कहानियां, नवाबी के जलवे, लखनऊ सदियों का सफर, पराया चांद आदि।
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रंगमंच और फिल्मों के लिए सृजन : नृत्य नाटिकाएं- प्रेम पियाला, आवर्तन, गंगावतरण, नारायणी नमोनम:, पार्थ सारथी, उषा परिणय आदि। इसके अलावा दूरदर्शन के लिए फिल्म का लेखन भी किया। शतरंज के खिलाड़ी फिल्म में शोध सहायक रहे, जुनून फिल्म के लिए शोध किया, गीत भी लिखे। उमराव जान फिल्म के लिए भी शोध किया। जहरे इश्क फिल्म के साथ भी जुड़े। नाट्य लेखन के लिए 1998 में उप्र संगीत नाटक अकादमी सम्मान प्राप्त हुआ।
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शान-ए-अवध हैं वो
वो लखनऊ की एक-एक ईंट के बारे में बता सकते हैं। उनके इस काम ने उनको बहुत बड़ा आदमी बनाया है। शान-ए-अवध हैं वो। वो लखनऊ की वसीयत हैं। खाली इतिहास नहीं बताते, लोक रीतियां, लोक रस से लोगों को जोड़ते हैं। अवध उनकी पहचान है और वो अवध की।
– डॉ. उर्मिल थपलियाल, वरिष्ठ रंगकर्मी
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सब पढ़ें अंक विलास
उनका व्यक्तित्व विशाल और कृतित्व विराट है। भारतीय संस्कृति को जानने समझने के लिए आपकी कृति अंक विलास सबको पढ़नी समझनी चाहिए। डॉ. योगेश प्रवीन पर केंद्रित अपनी पुस्तक सृजन के सोपान पर काम करते हुए मुझे उनकी काव्य कृति अपराजिता ने विशेष रूप से प्रभावित किया, जिसमें अयोध्या की छह ऋतुओं के साथ-साथ मन की ऋतुएं भी हैं।
– डाॅ. अमिता दुबे, संपादक, उप्र हिंदी संस्थान