वालिद चाहते थे कैफी आजमी को मौलवी बनाना, वह स्कूल पर फातिहा पढ़कर निकल आए

लखनऊ [दुर्गा शर्मा]: प्रसिद्ध गीतकार व कवि सैय्यद अतहर हुसैन रिजवी उर्फ कैफी आजमी की शख्सियत से हर कोई वाकिफ है। पर क्या आप ये जानते हैं कि हर हिंदुस्तानी की रगों में अपनी रचनाओं से जोश भरने वाले कैफी साहब को उनके वालिद मौलवी बनाना चाहते थे। कैफी आजमी जमीदारों और जागीरदारों के दौर में पैदा हुए थे। वालिद फारसी में अशआर कहते थे। घर में मीर अनीस के मर्सिये मोहर्रम में पढ़े जाते। कैफी साहब खुद कहा करते थे, मैं बचपन में जब सोता था, मेरी बड़ी बहन मीर अनीस के मर्सिये के कुछ बंद सुना देती थीं। मुझे मीर अनीस के मर्सियों की समझ तो नहीं थी, लेकिन शेरोशायरी से दिलचस्पी उसी वक्त से हुई। कैफी आजमी साहब की जयंती पर दैनिक जागरण उनके जीवन से जुड़े ऐसे ही रोचक किस्‍सों से आपको रूबरू करा रहा…

भाई कहते- कैफी जाओ पान लेकर आओ: कैफी आजमी की पैदाइश उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के छोटे से गांव मिजवां में 14 जनवरी 1919 को हुई। इनके पिता का नाम सैय्यद फतेह हुसैन रिजवी और मां का नाम हफीजुन्निसा था। कैफी ने आठ वर्ष की उम्र में ही लिखना शुरू कर दिया। कैफी साहब के तीन बड़े भाई लखनऊ और अलीगढ़ में पढ़ रहे थे, जब वो छुट्टियों में घर आते तो शेरोशायरी की महफिल सजती। कैफी साहब जाकर खड़े हो जाते तो उनके भाई उनसे कहते, तुम्हें क्या समझ आएगा। तुम जाकर पान वगैरह लेकर आओ। वह नाराज होकर बाहर आ जाते और बड़ी बहन से कहते कि बाजी देखिएगा, मैं भी बड़ा शायर बनकर दिखाऊंगा और उन्होंने ऐसा करके भी दिखा दिया। कैफी साहब ने 12 साल की उम्र में अपनी पहली गजल लिखी, वह बहुत मशहूर हुई। गजल को बेगम अख्तर ने गाया…

इतना तो जिंदगी में किसी के खलल पड़े

हंसने से हो सकून न रोने से कल पड़े

जिस तरह जी रहा हूं मैं पी पी के गर्म अश्क

यूं दूसरा जिये तो कलेजा निकल पड़े

मुद्ददत के बाद उसने जो की लुत्फ की निगाह

दिल खुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े।

वालिद चाहते थे मौलवी बने बेटा, वो भ्रष्टाचार से करने लगे जंग: शेरोशायरी से कैफी साहब की मुहब्बत बढ़ती जा रही थी, पर उनके वालिद चाहते थे वह मौलवी बनें। कैफी साहब का दाखिला लखनऊ के सुलतानुल मदारिस स्कूल में इस गरज से कराया गया कि वह मौलवी बनकर अपने बुजुर्गों का फातिहा पढ़ेंगे। कैफी साहब मौलवी तो नहीं बन सके, लेकिन स्कूल पर फातिहा पढ़कर निकल आए। उन्होंने स्कूल प्रबंधन के भ्रष्टाचार का विरोध किया और स्कूल से निकाल दिए गए। इसके बाद वह अपने पड़ोस के गांव माहुल (आजमगढ़) के रहने वाले प्रो. सै. एहतिशाम हुसैन से मिले, जिन्होंने उनको लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र नेता सरदार जाफरी से मिलवाया और उनके जरिए उनकी मुलाकात किसान मजदूर सभा ट्रेड यूनियन लीडरों से हुई और वह लखनऊ छोड़कर कानपुर की मिल मजदूर यूनियन में शामिल हो गए। वहां मिल मजदूरों के साथ गेट मीटिंग में शामिल होकर अपनी नज्मों और गजलों के जरिए मिल मजदूरों की मांगों को आवाम के सामने रखते।

..तो इसलिए मुंबई छोड़कर मिजवां आए कैफी: ऑल इंडिया कैफी आजमी अकादमी लखनऊ के महासचिव सैय्यद सईद मेहदी बताते हैं, मेरे वालिद की कैफी साहब से नजदीकी थी। मैं अपने वालिद के हुक्म पर लखनऊ से मिजवां कैफी साहब से मिलने गया था। मैंने जाकर जब अपना परिचय कराया कि मैं ताज माहुली का बेटा हूं तो उन्होंने चारपाई पर लेटे-लेटे हाथ बढ़ाकर मुझे गले से लगाया। बेहद खुश हुए और मुझसे कहने लगे कि तुम लखनऊ से आ रहे हो। मेरे पास यहां तुम्हारी खातिर के लिए कुछ भी नहीं। शौकत कैफी फौरन उठीं और दो ईंट खड़े कर के उस पर एल्यूमिनियम की पतीली रखकर अमरूद और बांस के सूखे पत्तों को जलाकर उन्होंने चाय बनाई। उम्र के उस पड़ाव में जब आदमी सहूलियत पसंद हो जाता है, तब कैफी साहब मुंबई छोड़कर अपने गांव मिजवां चले आए थे। वो अक्‍सर कहते, मैं इस जमीन का कर्ज उतारने आया हूं। गांव की औरतों ने उनके स्वागत में गीत गाया था..

रामचंद्र जी घरे आइले चौदह बरस बाद

मोरे कैफी भैया आइले चालिस बरस बाद…।

निजाम के खिलाफ गजल पर शौकत कैफी ने किया पसंद : कैफी साहब हैदराबाद के निजाम के दरबार में एक मुशायरे में शिरकत के लिए गए। वहां नवाब निजाम हैदराबाद के खिलाफ गजल पढ़ी, जिसके बाद शौकत कैफी ने इनको पसंद किया और इनकी उनसे शादी हो गई। इनकी तीन औलादें हुईं। पहली औलाद का इलाज के अभाव में इंतकाल हो गया। शबाना आजमी और बाबा आजमी अपने-अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय काम कर रहे। कैफी साहब ने फिल्मी दुनिया में गाने और बिलिट्ज अखबार में नई गुलिस्तां कॉलम में लिखकर बच्चों की परवरिश की।

कैफी आजमी के जीवन पर आधारित जावेद अख्तर की एक नज्म

अजीब आदमी था वो

मोहब्बतों का गीत था

बगावतों का राग था

कभी वो सिर्फ फूल था

कभी वो सिर्फ आग था

अजीब आदमी था वो

वो मुफलिसों से कहता था

कि दिन बदल भी सकते हैं

वो जाबिरों से कहता था

तुम्हारे सिर पे सोने के जो ताज हैं

कभी पिघल भी सकते हैं

वो बंदिशों से कहता था

मैं तुमको तोड़ सकता हूं

सहूलतों से कहता था

मैं तुमको छोड़ सकता हूं

हवाओं से कहता था

मैं तुमको मोड़ सकता हूं

वो ख्वाब से ये कहता था

कि तुमको सच करूंगा मैं

वो गरीबों से कहता था

मैं तेरा हमसफर हूं

मेरे साथ ही चलूंगा मैं

तू चाहे जितनी दूर भी बना ले अपनी मंजिलें

कभी नहीं थकूंगा मैं

वो जिंदगी से कहता था

कि तुझको मैं सजाऊंगा

तूं मुझसे चांद मांग ले

मैं चांद लेके आऊंगा

वो आदमी से कहता था

कि आदमी से प्यार कर

उजड़ रही है ये जमीन

कुछ इसका अब सिंगार कर

अजीब आदमी था वो

वो जिंदगी के सारे गम

तमाम दु:ख हरके सितम से कहता था

मैं तुमसे जीत जाऊंगा

कि तुमको तो मिटा ही दूंगा

एक रोज आदमी

भुला ही देगा ये जहां

मेरी अलग है दास्तां

वो आंखें जिनमें ख्वाब हैं

वो दिल है जिनमें आरजू

वो बाजू जिनमें हैं सकत

वो होंठ जिनमें लफ्ज हैं

रहूंगा उनके दर्मियां

कि जब मैं गीत गाऊंगा

अजीब आदमी था वो।

नाम: सैय्यद अतहर हुसैन रिजवी

उपनाम: कैफी आजमी

पिता: सैय्यद फतेह हुसैन रिजवी

जन्म: 14 जनवरी 1919, जिला आजमगढ़ तहसील फूलपुर ग्राम मिजवां

मृत्यु: 10 मई 2002, मुंबई

शिक्षा: सुलतानुल मदारिस, लखनऊ विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उर्दू, अरबी, फारसी की आला तालीम हासिल की।

संग्रह: झंकार, आवारा सजदे, आखिरी शब, इबलीस की मजलिसे शूरा, हीर रांझा, फिल्मी नगमों का संकलन, सरमाया, नई गुलिस्तां, कैफियात उनके प्रमुख संकलन हैं।

अवार्ड: पद्मश्री, उप्र उर्दू एकेडमी अवार्ड, महाराष्ट्र उर्दू एकेडमी अवार्ड, लोटस अवार्ड-सोवियत रूस, नगमा निगार अवार्ड आदि।

मैंने लखनऊ को नहीं, लखनऊ ने मुझे लिखा है…

जन्मदिन मुबारक : पद्मश्री डॉ. योगेश प्रवीन

दुर्गा शर्मा

28 अक्टूबर 1938 को गौसनगर (रकाबगंज) में जन्मे पद्मश्री डॉ. योगेश प्रवीन को पिता जीपी श्रीवास्तव और मां रमा श्रीवास्तव के संस्कारों ने अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों से प्रेम करना सिखाया। यह प्रेम और समर्पण उनके मन में इतना गहरे से जुड़ा कि उन्हें अवध संदर्भ में इतिहासकार माना जाने लगा। हालांकि, डॉ. योगेश ने परास्नातक की उपाधि साहित्यिक हिंदी और संस्कृत विषय में प्राप्त की और विद्यांत कॉलेज के हिंदी विभाग में प्रवक्ता के पद से सेवानिवृत्त हुए। सिर्फ हिंदी नहीं अंग्रेजी, बांग्ला और उर्दू भाषा पर भी इनका अधिकार है। रकाबगंज की तंग गलियों में बनी पीली कोठी पंचवटी में डॉ. योगेश के रूप में शहर का चलता-फिरता विनम्र ज्ञानकोष रहता है। लखनऊ से मुहब्बत में वो कहते हैं- मैंने लखनऊ को नहीं, लखनऊ ने मुझे लिखा है। फिर एक शेर पढ़ते हैं…

हम फकीरों से जो चाहे दुआ ले जाए 

फिर खुदा जाने किधर हमको हवा ले जाए।

इतिहास के झरोखे से झांकने के साथ ही कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, गीत गजल हर विधा को इनकी लेखनी ने लालित्य दिया। उनकी कविता लखनऊ की पहचान बन हर किसी की जुबान पर चढ़ गई…

लखनऊ है तो महज गुंबद ओ मीनार नहीं 

सिर्फ एक शहर नहीं कूच ओ बाजार नहीं…।

डाॅ. योगेश प्रवीन बुधवार को अपने जन्मदिन के दिन से ही आत्मकथा लिखना शुरू करेंगे। वो कहते हैं, मैं आत्मकथा के लिए तैयार नहीं था, पर समय के साथ लोगों का आग्रह बढ़ता ही रहा और अब मैं मना नहीं कर सका। आत्मकथा सिर्फ मेरी कहानी नहीं, इसमें अवध की परंपराएं भी होंगी। इसमें लखनऊ भी धड़केगा। वो आगे कहते हैं, हमारे लखनऊ में हर तरफ से लोग आए, जो आए लखनऊ की मुहब्बत में आए। उन्होंने लखनऊ के लिए किया, फिर लखनऊ ने उनको गौरवांवित किया। यशपाल पंजाबी, अमृत लाल नागर गुजराती, शिवानी कुमाऊंनी, एपी सेन बंगाली, भातखंडे मराठी थे, लखनऊ में सबका अवदान है। लखनऊ में न पत्थर ना संगमरमर, लखौरी ईंट से इमामबाड़ा, रूमी दरवाजा, हुसैनाबाद आदि गुलजार हैं। सब मिट्टी का करिश्मा है। चिकन भी तो कच्चे सूत का कमाल है। लखनऊ वो जगह है, जिसने अदना को अजमत अता की है। डॉ. योगेश कहते हैं, मुझसे ज्यादा लखनऊ वालों को इसकी फिक्र होनी चाहिए कि हम नई पीढ़ी को क्या धरोहर दे जाएंगे। मेरी दिली तमन्ना है कि मैं अपने घर को संग्रहालय के रूप में देख सकूं। यहां लाइब्रेरी बने। तकनीक से भी जुड़े, ताकि युवा पीढ़ी अवध के हुस्न और हुनर को करीब से जान सके।

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अवध संदर्भ में 25 किताबें  : लखनऊ नामा, दास्ताने अवध, जानेआलम रचित नाजो का रूपान्तर, ताजदारे अवध, गुलिस्ताने अवध, साहबेआलम, कंगन से कटार (ऐतिहासिक नाटक), डूबता अवध, मानोमेन्ट्स ऑफ लखनऊ (अंग्रेजी), हिस्ट्री ऑफ लखनऊ (अंग्रेजी), आपका लखनऊ, अवध के धरा अलंकरण, अवध में भित्ती चित्रांकन, लखनऊ की धरोहर, लक्ष्मणपुर की आत्मकथा, लखनऊ के मोहल्ले और उनकी शान, लखनऊ की शायरी जहान की जबान पर, अवध की बेगमें, रूलर्स ऑफ अवध (अंग्रेजी), लखनउवा कहानियां, नवाबी के जलवे, लखनऊ सदियों का सफर, पराया चांद आदि।

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रंगमंच और फिल्मों के लिए सृजन : नृत्य नाटिकाएं- प्रेम पियाला, आवर्तन, गंगावतरण, नारायणी नमोनम:, पार्थ सारथी, उषा परिणय आदि। इसके अलावा दूरदर्शन के लिए फिल्म का लेखन भी किया। शतरंज के खिलाड़ी फिल्म में शोध सहायक रहे, जुनून फिल्म के लिए शोध किया, गीत भी लिखे। उमराव जान फिल्म के लिए भी शोध किया। जहरे इश्क फिल्म के साथ भी जुड़े। नाट्य लेखन के लिए 1998 में उप्र संगीत नाटक अकादमी सम्मान प्राप्त हुआ। 

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शान-ए-अवध हैं वो

वो लखनऊ की एक-एक ईंट के बारे में बता सकते हैं। उनके इस काम ने उनको बहुत बड़ा आदमी बनाया है। शान-ए-अवध हैं वो। वो लखनऊ की वसीयत हैं। खाली इतिहास नहीं बताते, लोक रीतियां, लोक रस से लोगों को जोड़ते हैं। अवध उनकी पहचान है और वो अवध की।

– डॉ. उर्मिल थपलियाल, वरिष्ठ रंगकर्मी

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सब पढ़ें अंक विलास

उनका व्यक्तित्व विशाल और कृतित्व विराट है। भारतीय संस्कृति को जानने समझने के लिए आपकी कृति अंक विलास सबको पढ़नी समझनी चाहिए। डॉ. योगेश प्रवीन पर केंद्रित अपनी पुस्तक सृजन के सोपान पर काम करते हुए मुझे उनकी काव्य कृति अपराजिता ने विशेष रूप से प्रभावित किया, जिसमें अयोध्या की छह ऋतुओं के साथ-साथ मन की ऋतुएं भी हैं।

– डाॅ. अमिता दुबे, संपादक, उप्र हिंदी संस्थान

स्मृति शेष : विलायत जाफरी जी

(2 अक्टूबर 1932- 5 अक्टूबर 2020)

बहुत याद आएगा आवाज और रोशनी से खेलता जादूगर

दुर्गा शर्मा

बात 1969 की है। जलियांवाला बाग कत्लेआम को 50 साल होने को थे। हर फनकार बस यही सोच रहा था कि ऐसा क्या किया जाए कि यादगार हो जाए। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री और इंद्रकुमार गुजराल सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे। गुजराल साहब की इच्छा भी फनकारों के साथ थी। तय हुआ कि दुनिया भर में जो लाइट एंड साउंड के रवायती कार्यक्रम होते हैं, उसमें जिंदा कलाकार को रखकर एक नई चीज बनाई जाए। बस फिर क्या था, मोहन राकेश ने अालेख बनाया, अमृता प्रीतम ने गीत, सतीश भाटिया संगीत की धुन तलाशने लगे, दीनानाथ आवाज का जादू जगाने में लग गए, उनके मददगार हुए जोगेंद्र त्रेहन। भारत सरकार ने गीत और नाटक प्रभाग को निगरानी सौंपी और प्रोग्राम का नाम रखा गया- वीजन 1919। ड्रामा और पेशकश की जिंदगी में आई इस क्रांति को विलायत जाफरी साहब ने सफल कर दिखाया। उन्होंने 1969 में हजारों देखने वालों के सामने हिंदुस्तान का पहला रोशनी और आवाज प्रोग्राम वीजन-1919 पेश किया।

सारी दुनिया में होने वाले लाइट एंड साउंड के रवायती प्रोग्राम के इतर भारत में इसमें जिंदा कलाकार के शामिल हो जाने से यह प्रोग्राम और ताकतवर हो गया। सबसे बड़ा बदलाव ये आया कि प्रोग्राम किसी इमारत की कैद से निकलकर खुले मैदान में आ गया। इसके बाद तो देश भर में लाइट एंड साउंड के प्रोग्राम का सिलसिला चल पड़ा। बाद में बांग्लादेश की लड़ाई जीतने के बाद जो प्रोग्राम पुराना किला, दिल्ली में 1971 में हुआ था, उसकी स्क्रिप्ट विलायत साहब ने खुद लिखी। अब बारी थी बढ़ते कदम की जो 1971 से 1975 के बीच भारत के कई शहरों में खेला गया। लखनऊ, इलाहाबाद, पटना, दिल्ली, भोपाल, जालंधर, जम्मू और जयपुर में धूम मची। लखनऊ में बेलीगारद में जो प्रोग्राम बढ़ते कदम के नाम से उन्होंने प्रस्तुत किया, इसकी कामयाबी का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि वह 158 रातों यानि लगातार पांच महीनों से ज्यादा पेश किया जाता रहा है। रौनक ये कि हर रात दो शो हाेते थे। भारत के आठ शहरों में 482 शो हुए। अपनी तमाम स्मृतियां को छोड़कर प्रसिद्ध नाटककार, कलमकार, रंगमंच निर्देशक, दूरदर्शन के प्रतीक और आवाज व रोशनी से खेलता जादूगर चला गया…।

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इप्टा के आजीवन सदस्य थे

भारतीय जन नाट्य संघ( इप्टा), प्रगतिशील लेखक संघ , साझी दुनिया एवं आॅल इंडिया कैफी आजमी अकादमी ने विलायत जाफरी के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी। वे दिल्ली में कुदीशिया बेगम,हबीब तनवीर तथा शीला भाटिया के साथ इप्टा में शामिल हुए थे। बाद में वे आकाशवाणी और दूरदर्शन के साथ जुड़ गए। उन्होंने लाइट और साउंड के माध्यम से कई अभूतपूर्व प्रस्तुतियां दीं। वे पत्नी मशहूर रंगकर्मी कृष्णा जाफरी के साथ इप्टा के आजीवन सदस्य थे तथा ऑल इंडिया कैफी आजमी एकेडमी लखनऊ के संरक्षक होने के साथ लेखन,नाट्य एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में हमेशा शामिल रहते थे। साझी दुनिया की ओर से रूपरेखा वर्मा, इप्टा की ओर से राकेश, प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से सूरज बहादुर थापा तथा कैफी आजमी अकादमी की ओर से सैयद मेहदी ने उनकी याद में शीघ्र एक बड़ा कार्यक्रम करने का संकल्प लिया।

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बिना नाटक देखे ही वापस लौट गए थे

वरिष्ठ रंगकर्मी सर्यमोहन कुलश्रेष्ठ ने बताया कि दूरदर्शन में काम करने के साथ वो नाटकों का भी निर्देशन करते थे। वो मेरे नाटकों के प्रशंसक रहे हैं। अपने घर से खुद गाड़ी चलाकर मेरे नाटक देखने आते थे। एक बार मुझे बहुत अफसोस हुआ था, जब वो नाटक देखने आए थे, लेकिन हॉल के अंदर अत्यधिक भीड़ होने के कारण प्रवेश नहीं कर सके थे। बाद में उन्होंने मुझे मैसेज करके बताया था कि मैं बिना नाटक देखे ही वापस आ गया था। वो रंगमंच से बहुत प्यार करते थे। मेरी उनसे अक्सर फोन पर बात होती रहती थी। करीब 15-20 दिन पहले भी मेरी उनसे बात हुई थी। उनकी पत्नी कृष्णा जाफरी ने मेरे नाटक में अभिनय भी किया है। 

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जब वो बोले, नाम के लिए ऑडिशन दे दीजिए

वरिष्ठ रंगकर्मी डॉ. अनिल रस्तोगी ने बताया कि जब वो दूरदर्शन के निदेशक थे तो उससे पहले बिना ऑडिशन के कुछ लोगों को ए ग्रेड कर दिया गया था। मैं उस समय काफी नाराज हुआ था और मैंने उनसे कहा था मैं भी दूसरों की तरह ऑडिशन दिए बिना ए ग्रेड लूंगा। उन्होंने मुझसे कहा था कि पहले जैसे लोगों ने गलती की है आप मुझसे वैसी उम्मीद ना करिए। आप नाम के लिए ऑडिशन दे दीजिए, मैं जानता हूं आप सक्षम हैं बस इतनी मेरी बात रख लीजिए। वो अपनी बात इतने प्यार से कहते थे कि आप उन्हें मना नहीं कर सकते थे। करीब डेढ़ दो वर्ष पहले मुंबई में उनसे मुलाकात हुई थी। जिसको उन्होंने दोस्त माना वो जिंदगी भर के लिए उनका दोस्त हो गया। 
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…जब अगले दिन मिलने बुलाया

वरिष्ठ रंगकर्मी गोपाल सिन्हा ने कहा कि जब वो लखनऊ दूरदर्शन के निदेशक थे, उस समय हम लोगों ने बाबू हरदयाल हास्य नाट्य समारोह शुरू किया था। वो नवंबर, दिसंबर के महीने में पांच दिन होता था। जब वो हमारे प्रोग्राम में आए तो उन्होंने पूछा कि तुम लोग इसकी पब्लिसिटी कैसे करते हो। हम लोगों ने बताया कि हम लोग जगह- जगह पर पोस्टर और बैनर लगाते थे। उन्होंने हम लोगों को अगले दिन मिलने बुलाया। जब हम उनसे मिलने पहुंचे तो उन्होंने हमारे नाटक का शेड्यूल मांगा। हम लोगों ने कहा हम लोगों के पास तो इतना पैसा नहीं है तो वो बोले आप इसकी चिंता ना करें। हम इसका प्रसारण टेलीविजन पर करेंगे। तब ये बहुत बड़ी बात थी। उस समय शाम को समाचार से पहले वो शीट स्क्रीन पर रोल की जाती थी। उसका नतीजा ये रहा कि रवींद्रालय में प्रोग्राम होता था और लोग सीतापुर, बाराबंकी से नाटक देखने आते थे। उनका ये योगदान हमेशा याद रहेगा।
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गंगा जमुनी तहजीब का सितारा टूट गया

अभिनेता राजू पांडेय बताते हैं, 1999 में मैंने गन्ना संस्थान के सभागार में विलायत साहब का नाटक शतरंज के मोहरे देखा। अद्भुत नाटक था। फिर भारतेंदु नाट्य अकादमी रेपेट्ररी के दौरान जाफरी साहब ने मेरे कई नाटक देखे और हौसलाअफजाई की। इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में मेरी एक शॉर्ट फिल्म की स्क्रीनिंग थी, उसे देखने के बाद जाफरी साहब ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा-अच्छा काम किया है। उनके आशीष वचनों के तमाम संस्मरण हमेशा ताजा रहेंगे। जाफरी साहब क्या गए गंगा जमुनी तहजीब का एक सितारा टूट गया।

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परिचय : संक्षेप में

जन्म : 2 अक्टूबर, 1932, रायबेरली, उप्र

शिक्षा :

– कुरआन शरीफ और दीनियात- मोलवी मोहम्मद इब्राहिम

– हिंदी और संस्कृत-पंडित राम दुलारे

– महात्मा गांधी कॉलेज, रायबरेली, उप्र

– लखनऊ विश्वविद्यालय।

– विलायत जाफरी के परदादा 1857 में अंग्रेजों से लड़े और उन्हें फांसी हुई।

– आजादी की लड़ाई लड़ते हुए दादा 1921 में लंबे अरसे तक अंग्रेजों की जेल में रहे।

– भारत में दूरदर्शन के जन्म से ही दूरदर्शन के लिए लेखन। दूरदर्शन लखनऊ में निदेशक भी रहे।

– आकाशवाणी लेखन छह दहाइयों से।

– रंगमंच से जुड़ाव 1952 से।

– थियेटर के लेखक और निर्देशक के रूप में विदेश मंत्रालय के आइसीसीआर के पैनल मेंबर।

– भारत में लाइट एंड साउंड प्रोग्राम के जन्मदाताओं में।

– मेंबर स्क्रिप्ट कमेटी, नेशनल फिल्म डवलपमेंट कारपोरेशन, मुंबई- 1985-86

– लाइफ मेंबर फिल्म राइटर्स एसोसिएशन, मुंबई।

– मेंबर, इंटरनेशनल जूरी, गोल्डेन पराग, यूरोप- टीवी फेस्टिवल अवार्ड-1989

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मशहूर नाटक और दूरदर्शन धारावाहिक

कहानियों और नाटकों की दस किताबें प्रकाशित, जिसमें नाटक जहर कौन पिये को उर्दू अकादमी दिल्ली और जम्मू कश्मीर सरकार का अवार्ड मिला था। कहानी संग्रह गुस्ताखियां को उर्दू अकादमी उप्र का अवार्ड। मशहूर नाटकों में एक जमा दो, शतरंज के मोहरे और शाहजहां आदि। दूरदर्शन धारावाहिक आराम, काला चोर और नाटक आगा हश्र का रूस्तम सोहराब खूब पसंद किए गए। दूसरे मशहूर धारावाहिक नीम का पेड़ जोकि डॉ. राही मासूम रजा और विलायत जाफरी ने मिलकर लिखा, शेरशाह सूरी और आधा गांव।

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गालिब पर अनूठा काम

लाइट एंड साउंड पर अब तक गालिब पर कोई काम नहीं हुआ था, जब विलायत जाफरी ने 1978 में रोशनी और आवाज के माध्यम के जरिए गालिब को पहली बार पहुंचवाने की कोशिश की। विलायत जाफरी ने इस उम्दा अंदाज में गालिब को पेश किया कि सिर्फ उन की जिंदगी ही नहीं उन की शायरी की अजमत, उनकी शख्सियत की दिलकशी हर चीज सामने आ गई। गालिब पर विलायत जाफरी के लाइट एंड साउंड प्रोग्राम की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि इसके लिए उर्दू को जानना जरूरी नहीं है। बाद में इस पर इनकी किताब भी आई, जिससे विमोचन के लिए अंतिम बार उनका लखनऊ आना हुआ था।

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कुछ मशहूर लाइट एंड साउंड प्रोग्राम

– पुराना किला, दिल्ली- 1971

– बढ़ते कदम, लखनऊ एवं भारत के दूसरे भागों में- 1974

– बहादुरशाह जफर, हुमायूं मकबरा दिल्ली- 1976

– गालिब, जहाजमहल, महरौली, दिल्ली- 1978

– अनारकली, चंडीगढ़- 1980

इस तरह के करीब 22 प्रोग्राम सारे भारत में।

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अवार्ड

– संगीत नाटक अकादमी का सबसे बड़ा अवार्ड अकादमी रत्न – 2018

– उर्दू अकादमी दिल्ली अवार्ड- 1989

– कम्यूनल हारमनी अवार्ड- 1990

– भारत ज्योति अवार्ड- 1991

– कबीर अवार्ड- 1992

– उर्दू अकादमी उप्र अवार्ड- 1997

– यूपी रत्न अवार्ड – 1997

– तुलसी सम्मान – 2007

– आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग पुरुष सम्मान – 2007

– उप्र गौरव सम्मान – 2016

– वकार-ए-अवध अवार्ड- 2018

इसके अलावा तमाम अन्य अवार्ड।

(दैनिक जागरण, लखनऊ)

साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

लखनऊ के स्मार्ट व्यंग्यकार

लखनऊ के व्यंग्यकार सिर्फ लेखन में नहीं, देखन में भी सबसे आगे हैं। ये दावा युवा व्यंग्यकारों की आपसी सहमति है। व्यंग्यकार साथी के जन्मदिन पर व्यंग्य विभूषण का ऑनलाइन प्रेम बरसा। व्यंग्य विभूषण ने ‘जनहित में जारी’ कर कहा- ‘आज लखनऊ के व्यंग्य घराने के सबसे स्मार्ट व्यंग्यकार का जन्मदिन है। ‘ इस पर साथी ने ‘ जीजा-साली ‘ की पुरानी कहानी याद दिलाई। हुआ कुछ यूं था कि फेसबुक पर जब दोनों के बीच स्मार्टनेस का सर्वे हुआ तो दूसरे दोस्त की साली मैदान में उतर आईं और ‘ डंके की चोट पर’ जीजा को सबसे स्मार्ट बताया। इससे पहले की तलवारें खिंच जातीं, जीजा ने साली को यह कहते हुए शांत कराया था कि इस आंदोलन से उनकी मेल फैन फॉलोविंग घट सकती है। खैर, आज जब एक दूसरे का गला काटने के ‘सभी विकल्प खुले हुए हैं’ तब किसी को स्मार्ट कहने वाली यह लखनवी मोहब्बत बनी रहे।

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सकारात्मक सुरमयी संवाद

एक सच्चा संगीत साधक वही, जो किसी भी परिस्थिति में सुरों का साथ न छोड़े। संगीत में उसके प्राण बसे। वो जहां हो, साज़ की मिठास घुलती रहे, फिर चाहे वो घर हो या अस्पताल का बेड। दूसरे राज्य की एक वरिष्ठ कलाकार को कोरोना के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। चारों ओर अजीब सी खामोशी लगी तो वरिष्ठ कलाकार ने अस्पताल से ही अपना गीत रिकॉर्ड कर शुभचिंतकों से पूछा- ये चुप सी क्यों लगी है, अजी कुछ तो बोलिए … । बस फिर क्या था, उनका फोन लगातार घनघनाता रहा। शहर की संगीत विदुषी ने भी वरिष्ठ कलाकार का हाल चाल लिया। जल्द ठीक होने की सुरीली बधाई भी दी। कोरोना काल में दो वरिष्ठ संगीत साधकों के बीच सुरमयी संवाद ने सकारात्मक का संचार किया। आखिरकार वरिष्ठ कलाकार ने कोरोना को मात दी और इस बात को फिर सिद्ध किया कि संगीत किसी औषधि से कम नहीं।

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रंगमंच की पाठशाला के अजब नियम से वार-पलटवार

रंगमंच की पाठशाला में कुर्सी के लिए जोर का तोड़ हो रखा है। पाठशाला के संविधान के अनुसार क्लर्क प्रबंधक, प्रबंधक सहायक निदेशक तो सहायक निदेशक कार्यवाहक बन सकता है। यहां तकनीकी पदों के अनुरूप डिग्री, डिप्लोमा छोड़िए सर्टिफिकेट भी नहीं है, फिर भी काम चल रहा। जिम्मेदार लोगों के नाम पर सिर्फ क्लर्क और बाबू ही हैं और ये पाठशाला की ऊंची कुर्सी के लिए एक-दूसरे पर पीठ पीछे से वार करा रहे। फिलहाल चार वर्षों से ऊंची कुर्सी पर काबिज साहब निशाने पर हैं। साहब परेशान हैं कि पाठशाला के अतिथि वरिष्ठजन जब तक आदान-प्रदान ठीक चला तो उनके आंगन में खूब खेले, पर अब पाला बदले है। ध्वनि-प्रकाश उपकरण के लिए नियुक्त लोगों को न उपकरण जानते है और न नियुक्त लोग उपकरणों को। सब नेतागीरी में रमे हैं। पाठशाला से प्रशिक्षित छात्र अपनी सेवा देना चाहें तो नेताजी लोग रास्ता बंद किए है।

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एक नहीं, कई लकीरें नई खींची जा रहीं

शास्त्रीय संगीत को समर्पित वाट्सएप ग्रुप पर रोचक चर्चा चली। सज्जन ने मुद्दा उठाया- लकीर , कोई नई खिंचेगी? उनका इतना पूछना था कि जवाबों और विचारों की बाढ़ सी आ गई। एक ने कहा- लकीर तो नई खींची जा ही रही है मान्यवर। अभिभावकों की जो पीढ़ी अपनी नई पीढ़ी को मोबाइल का दास बताकर निकम्मा करार देती थी, अब वे स्वयं भी टेक्नोलॉजी संपन्न होने की दिशा में जद्दोजहद कर रहे। कलाकार जिस इंटरनेट से दूर रहने की बात करते थे, अब उसी से दाल रोटी चला रहे। जो लाखों की पेटी रखवा कर मंच पर चढ़ते थे, वे भी मुफ्त सिखा रहे। एक दिन में चार नगरों में प्रवास करने वाले भी महीनों से घर बैठे हैं। एक नहीं, कई लकीरें नई खींची जा रही हैं। इस जवाब से उत्तरदाता ने इतनी बड़ी लकीर खींच दी कि प्रश्न पूछने वाला ही निरुत्तर हो गया।

दुर्गा शर्मा

दैनिक जागरण लखनऊ

साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

दौड़ती-भागती जिंदगी के बीच भागता कथक

जिक्र चाहे कथक का हो या कथकाचार्यों की बात चले, जेहन में सबसे पहला नाम लखनऊ का आता है। वरिष्ठ कथक गुरु की बात पर शत प्रतिशत सहमति जताते हुए हमने आगे जोड़ा- कथक जगत में लखनऊ सिरमौर था, है और आगे भी रहेगा। उन्होंने यहीं पर हमें रोक दिया और बोलीं- था और है तक तो ठीक है, पर आगे भी रहेगा, कह नहीं सकते। जिन कथक गुरुओं को याद किया जाता है, जिन्हें देश-दुनिया में पहचाना जाता है, वो पुराने नाम ही हैं। इसमें कोई नया नाम जुड़ा हो तो बताइए। हमें कोई ऐसा नया कलाकार बताइए जिसमें लखनऊ कथक घराने के वैभव को आगे ले जाने की संभावना ही नजर आती हो। वो खुद आगे जा रहे, पर लखनवी कथक पीछे छूट रहा। वो लखनवी कथक जिसकी पहचान नजाकत और नफासत है। दौड़ती-भागती जिंदगी के बीच कथक भी भाग रहा, वो ठहराव कहीं गुम हो गया है।

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कोरे किस्सों से भरा ज्ञानकोष

हिंदी और पंजाबी साहित्य में जिस नाम को शिद्दत से याद किया जाता है, वो हैं-पद्म विभूषण, पद्मश्री, साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुस्कार से सम्मानित लेखिका अमृता प्रीतम। साहित्य की एक परंपरा है- यूं हम किसी भी बड़े नाम को साल भर भूले रहें, पर जयंती और पुण्य तिथि पर उससे संबंधित ज्ञान जरूर उमड़ता है। सम्मानित लेखिका अमृता प्रीतम की जयंती (31 अगस्त) पर भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक सज्जन ने अमृता प्रीतम के बारे में कहानियों का खजाना खोला। उस खजाने में लेखिका अमृता प्रीतम नदारद थीं। सज्जन के ज्ञानकोष से अमृता प्रीतम और साहिर लुधियानवी की कहानी निकली। हमने कहा ये छोड़िए, कुछ और बताइए तो वो लेखिका के साथ इमरोज को ले आए। हमने बोला, उनकी कलम को याद कीजिए, उस पर बात कीजिए, तो वो एक पल सोचने लगे। हम जान गए महोदय का ज्ञानकोष सिर्फ सुने सुनाए कोरे किस्सों-कहानियों से ही भरा है।

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वीडियो संदेश के जरिए सरकार से सवाल

संगीत साधना और सेवा है, पर भूखे पेट तो भजन भी नहीं होता, फिर सुर-ताल कैसे सजे? एक कलाकार ने वीडियो संदेश के जरिए सरकार से कई सवाल किए हैं। उनके सवाल लाजिमी भी हैं, साथी कलाकार इसका समर्थन भी कर रहे। वीडियाे में कहा गया है कि देश भर में संगीत के तमाम संस्थान हैं। हर संस्थान के पास कार्यक्रम का बजट भी होता है। कोरोना काल में कोई कार्यक्रम तो हो नहीं रहे और आगे कुछ महीनों तक कार्यक्रम होने की गुंजाइश भी नहीं लग रही। ऐसे में वो बजट कहां है? वो बजट कलाकारों के कल्याण में क्यों नहीं लगाया जा सकता? पांच महीने से किसी कलाकार ने कोई कार्यक्रम नहीं किया, पैसे कहां से कमाएंगे? क्या खाएंगे, बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे। कलाकार सिर्फ पोस्टर पर छपने के लिए नहीं होते। अगर कला संस्कृति को जिंदा रखना कलाकार का काम है, तो आपका भी दायित्व है।

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पाठक कम न हों… पत्रिकाएं बंद न हों

धन का पता नहीं, पर कलम संतोष प्राप्ति का उपक्रम जरूर है। कलमजीवियों से संतोषी भी और कोई नहीं। कोरोना काल में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में एक सज्जन के बड़े-बड़े लेख छप रहे। ऐसे वैसे लेख नहीं, शोधपरक कला केंद्रित लेख। वो अपने लेखों में कला जगत की विभूतियों से लेकर विभन्न नृत्य शैलियों के बारे में विस्तृत जानकारी भी देते। अपने लेख को समृद्ध करने के लिए खूब पढ़ते और अनुभवी लोगों से संवाद भी करते। हमने पूछा, लेख के लिए इतना परिश्रम करते हैं, मेहनताना भी मिल रहा या नहीं? वो बड़ी विनम्रता के साथ बोले- कोरोना ने हर चीज को ऑनलाइन कर दिया। पत्रिकाएं बंद हो रहीं, ई बुक लॉन्च हो रहे। बंद होती पत्रिकाओं के बीच लेख के लिए मेहनताना कौन देगा? हमने हैरानगी के साथ कहा- फिर लिख क्यों रहे? उन्होंने कहा- हम लिख रहे ताकि पत्रिकाओं के पाठक कम न हों। पत्रिकाएं बंद न हों।

दुर्गा शर्मा

दैनिक जागरण लखनऊ

साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

कलाकार महोदय का कायाकल्प

कोरोना काल में कलाकार महोदय ने अपना कायाकल्प ही कर डाला। शूटिंग थी बंद और कोई काम-धाम था नहीं तो जनाब ने अपने शरीर को ही काम पर लगा दिया। रात-दिन एक करके वजन घटा ही लिया आखिर और सींग कटाकर हो गए बछड़ों की लिस्ट में शामिल। अब सबको फ्री की हेल्थ टिप्स बांट रहे हैं। वैसे अंदर की खबर ये है कि किसी मोहतरमा ने उनके बढ़े हुए पेट पर कभी चुटकी लेते हुए कहा था कि “आपके पहुंचने से पहले तो आपका पेट पहुंच जाता है।” फिर क्या था जनाब ने दिल पर ले ली बात और पेट गायब करके ही माने। अब मोहतरमा के साथ उनकी बात कहां तक पहुंची पता नहीं, लेकिन वजन को अपनी हद में जरूर पहुंचा दिया। नाराज न होइएगा, वैसे असल क्रेडिट तो मोहतरमा को ही दिया जाना चाहिए। न वो टोकतीं, न भैया जी दुबलाते । भैया जी स्माइल प्लीज…।

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दुधबोली की हिचकिचाहट

दुधबोली यानी वो भाषा जिसमें हमने तुतलाकर पहले पहल अपने आस-पास की दुनिया से संवाद कायम करना शुरू किया। बचपन छूटता गया और हम दुधबोली के संग ही देश-दुनिया की तमाम भाषाओं के साथ जुड़ गए। अन्य भाषाओं के साथ हम ऐसा जुड़े कि दुधबोली कहीं पीछे रह गई। जिस भाषा और बोली को हम समझ तो लेते हैं, पर बोलने में हिचकिचाहट होने लगी। इसी हिचकिचाहट के साथ दुधबोली में कवि सम्मेलन का ऑनलाइन मंच सजा। एक भी युवा चेहरा नहीं दिखा। लगा दुधबोली सिर्फ बुजुर्गों के लिए है। मगर दुधबोली में काव्य पाठ के लिए वरिष्ठों को भी किताब या कागज में लिखी कविता को सामने रखना पड़ा। कुछ ने हिंदी की पहुंच ज्यादा कहकर दुधबोली में अपना वक्तव्य नहीं रखा। चलिए, कोई बात नहीं। सुखद ये रहा कि कम से कम दुधबोली में आयोजन तो हुआ। हर किसी ने अपने स्तर पर भरसक प्रयास तो किया।

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स्क्रिप्ट तो अलग होती, पर नृत्यांगना वही

कोरोना काल में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नित नये कलाकार उभर रहे। उभरती हुई प्रतिभाओं को प्रमोट करने वालों की भी कोई कमी नहीं और ऐसा करना भी चाहिए। बात-बात पर खुद को कलाकारों का मसीहा बताने वाले साहब भी आजकल इसी पुण्य काम में लगे हैं। एक बाल नृत्यांगना की तारीफ में कसीदे पढ़ने और लंबे-लंबे प्रेस नोट लिखने में उनके दिन-रात एक हो रहे। हर दूसरे दिन वाट्सएप पर खर्रा आ जाता। हर बार स्क्रिप्ट तो अलग होती, पर नृत्यांगना वही। आपदा में छिपा कोई भी अवसर वो नहीं छोड़ते। कोरोना जागरूकता गीत हों या राम भजन…बच्ची को प्रस्तुति के लिए प्रोत्साहित करते हैं। अब बच्ची इतनी मेहनत करे और अखबार में फोटो न छपे, ऐसा तो हो नहीं सकता। फोटो आते ही बच्ची की मम्मी के चेहरे की चमक दोगुनी हो जाती है, जिसे देखकर महोदय को अपने हिस्से की पूंजी मिल जाती है।

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आवाज खोलने के चक्कर में आधा दम निकल गया

कुछ सुनाई नहीं दे रहा। आवाज खोलिए जनाब…। इस गुजारिश को सुनकर वो पहले से भी तेज आवाज में बोलने लगे। अभी भी कुछ सुनाई नहीं दे रहा, आवाज खोलिए…। उन्होंने अपनी आवाज और बुलंद कर दी। बुजुर्गवार अबाध गति से काव्य की अविरल धारा बहाते रहे, पर लोगों को कुछ भी सुनाई नहीं दिया। आवाज खोलिए-आवाज खोलिए भी होता रहा। तभी होस्ट ने संदेश को और स्पष्ट करते हुए कहा, एप का ऑडियो खोलिए जनाब। कविवर को संदेश समझ में अा गया, उन्होंने एप के ऑडियो पर क्लिक किया, तब जाकर उनका काव्यपाठ हर किसी को सुनाई दिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- ऑफलाइन कवि को ऑनलाइन महफिल में आना भारी पड़ गया। आवाज खोलने के चक्कर में हमारा आधा दम निकल गया। बचे-खुचे दम से अब बाकी कविता सुनाएंगे। श्रोता बोले, शुरू कीजिए साहब, आपके साथ हम भी दम लगाएंगे, जोरदार ताली बजाएंगे।

दुर्गा शर्मा, दैनिक जागरण

(लखनऊ)

साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

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समझने वाले समझ गए हैं

व्यंग्य विसंगतियों से साक्षात्कार कराता है। व्यंग्य की जितनी भूमिका साहित्य में है, उससे कहीं ज्यादा समाज में। व्यंग्य आईना लेकर चलता है। आईना लेकर चलना कोई सरल काम भी नहीं, टूटने का डर बना रहता है, इसलिए भी व्यंग्यकारों को तमाम एहतियात का ध्यान रखना पड़ता है। वाे लड़ते भी हैं, पर हाथ में तलवार नहीं होती। जुबानी तीर चलते हैं, समझने वाला उसकी दिशा भांप लेता है। ठीक वैसे ही जैसे पढ़ने वाला व्यंग्यकार की दृष्टि और संकेतों की भाषा में छिपा अर्थ समझ लेता है। विसंगति से मुठभेड़ करने वाले व्यंग्यकार जब आपस में उलझते हैं तो भी अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ते। संकेतों में ही कलह परवान चढ़ती है। जो स्पष्ट शब्दों में जंग छेड़ दे, फिर वो व्यंग्यकार ही कहां। खैर, आप करते रहिए आंखों ही आंखों और इशारों में बात, समझने वाले समझ गए हैं- व्यंग्यकार बंधु उलझ गए हैं।

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संगीत सेवा कैसे होगी!

उन्होंने पूछा- …और क्या चल रहा है? हमने कहा- दो ही चीजें चल रहीं हैं आजकल- पहला इम्युनिटी बढ़ाओ और दूसरा आत्मनिर्भर बनो। हम भी इन्हीं दोनों के बीच विचरण कर रहे। उन्होंने कहा- इम्युनिटी की पाठशाला तो खूब चल रही। आप हमें आत्मनिर्भर बनने के कुछ तरकीब सुझाइए। तरकीब ऐसी हो कि संगीत की सेवा भी हो जाए और हम आत्मनिर्भर भी बन जाएं। हमने कहा- शर्त के साथ सेवा कहां होती है? वो बोले- कोरोना ने सब बदल दिया है तो संगीत सेवा के क्षेत्र में भी कुछ बदलाव लाजिमी है। भूखे पेट तो भजन भी नहीं होता है, संगीत सेवा कैसे होगी। उनकी बात में दम था। उन्होंने हमें सोचने पर मजबूर किया कि ऑनलाइन मंच पर गाना-बजाना तो खूब हो रहा, पर वो किसी भी तरह से संगीत सेवा नहीं। यूं ही चलता रहा तो कहीं संगीत सेवकों की प्रजाति लुप्त न हो जाए।

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खरी-खोटी सुनाता था, पर शायर अच्छा था

अपनी शायरी से सत्ता को ललकारने वाली आवाज ने हमेशा के लिए चुप्पी साध ली। युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक की महफिल बेनूर हो गई। अपनी बुलंद आवाज से मंच पर आते ही लोगों को खामोश कर देने वाले खुद मौन हो गए। उनकी शायरी का बढ़ता प्रभाव उन्हें बॉलीवुड तक खींच लाया था। न जाने कितने ही गीत उनकी कलम से निकलकर लोगों की जुबान पर चढ़ गए। शायरी का अलग अंदाज-ए-बयां थे राहत इंदौरी। काव्य जगत के कुछ चेहरे उन्हें शायर कम मदरसा छाप ज्यादा बताकर उनसे बेहतर लिखने और कहने का दम भर रहे। कुछ ऐसे कविवर भी हैं, जिन्होंने उन्हें जहर उगलने की मशीन बताकर पूरी कविता ही तैयार कर डाली। धड़ाधड़ पोस्ट कर उनके मौत का जश्न मनाने की अपील भी की। हम आपसे बस यही कहेंगे कि खरी-खोटी सुनाता था, पर शायर अच्छा था। आपने उन्हें वैसा देखा जैसा आपका चश्मा था।

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आराध्य के साथ हंसी-ठिठोली करते कलाकार

दुर्गा शर्मा)

संगीत ईश्वरीय उपादान है। कभी-कभी संगीत स्वयं ईश्वर ही हो जाता है। दोनों के बीच का भेद मिट जाता है। तभी तो हमारे कलाकार लोकगीतों में अाराध्य के साथ हंसी-ठिठोली और छेड़छाड़ भी कर लेते हैं। पग घुंघरू बांध थिरकते भी हैं। उपास्य के दास, सखा, सेवक यहां तक कि स्वामी भी बन सकते हैं। पर अनेक रूपों में आराध्य से प्रेम करने का ये संबंध आपको समझ नहीं आता। आप तो श्रीकृष्ण रूप में सजे कलाकार को देखकर सवाल दागते हैं कि कान्हा क्या मूंछ भी रखते हैं? फिर ठहाका लगाकर पूछते हैं, ये अाप लोग आए दिन त्योहार क्यों मनाते हैं? गम के समय में भी आनंद की नदी में डुबकी कैसे लगाते हैं? हमें आपको कोई जवाब नहीं देना, क्योंकि जहां आस्था होती है वहां सवाल-जवाब नहीं होते। भक्त और भगवान के बीच की इस वैचारिक स्वतंत्रता को आप नहीं समझ सकते।

दुर्गा शर्मा (लखनऊ)

साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

मैडम के खास मातहत

संगीत शिक्षा की बगिया ने आजादी की सांस ली है। 11 वर्षों से एकछत्र राज कर रहीं सुरमयी आवाज पर मिजाज गरम वाली मैडम से सुरों की बगिया मुक्त हो गई है। इस बार मैडम का मराठी कनेक्शन कार्ड भी नहीं चला। चले भी क्यों! कुर्सी पर काबिज चेहरा बदलने के साथ ही मैडम की सत्ता भी उलट गई। मैडम के गौरवशाली इतिहास के कारण उन्हें राज्यपाल द्वारा निष्कासन का सम्मान दिया गया। वो इस सम्मान के साथ आजकल अपना कुछ खास सामान (गोपनीय फाइलें ) जो उनकी यश कीर्ति में और भी वृद्धि कर सकता है, उसे भी झपटने की फिराक में हैं। सुना है उनके खास मातहत उनके जगजाहिर हो चुके महान कामों को शासन से छिपाने के लिए इन फाइलों को ” आबरा का डाबरा छू” कर रहे हैं। देखना है कि कितनी जल्दी पुलिस प्रशासन हरकत में आकर इस ‘नए फाइल घोटाले’ के बाजीगरों को धर दबोचती है।

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गंभीरता का गमछा …

हास्य रस परेशान है कि वो कहां से निकले। हंसी-ठिठोली के साथ जागरूकता का संदेश नहीं दे सकते, इसलिए हंसोड़ चेहरे भी गंभीरता का गमछा ओढ़े हैं। गमछे को इतना एहतियात से बांधा है कि हंसने से फंसने का कोई मौका नहीं। खासकर सोशल मीडिया के अति सक्रिय सुधीजनों को संबोधित करते वक्त। महामारी पर बात करते हुए हमेशा अलर्ट मोड ऑन रहता है कि कहीं आदतन हंसी की फुलझड़ी और पटाखे न छूट पड़ें। सच मानिए, गांभीर्य संबोधन सरल काम नहीं। आईने के सामने घंटों अभ्यास करना पड़ता है। फ्लैश मारती बत्तीसी पर शटर गिराना होता है। एक झटके में नहीं, लफ्जों को हौले-हौले आजाद करना पड़ता है। इतने भर से काम नहीं चलता, फ्रिकमंदी दिखाने के लिए मुंह भी लटकाना होता है। ठहाकों की दुनिया के बाशिंदों के लिए अजब मुसीबत है, लेकिन चेहरे पर गंभीरता का गमछा वक्त की जरूरत है।

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जब रक्षक बहन के दर पर पहुंचे व्यंग्य विभूषण

व्यंग्य विभूषण ने अनोखे अंदाज में रक्षाबंधन मनाया। रक्षासूत्र खरीदा और बहन के पास पहुंचे। कविवर ने बहन की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा और बोले-बहना मेरी, राखी के बंधन को निभाना। बहन ने भी संकल्पित सुर में कह दिया- मैं वचनबद्ध हूं भैय्या… आपके सम्मान की रक्षा के लिए। कुत्सित इरादे से छलने वाली दुष्ट नारी के झूठे आराेपों से व उसके द्वारा सृजित कानूनी आतंकवाद से आपकी सुरक्षा करने का वचन देती हूं। कविवर द्वारा राखी बांधने की तस्वीर के साथ वचन की ये पंक्तियां सोशल मीडिया पर छाई रहीं। हमारी भी इस पर नजर पड़ी। जेहन में सवाल कौंधा कि बेधड़क होकर ‘लड़कियां बड़ी लड़ाका होती हैं…’ लिखने वाले निर्भीक कविवर नारी से डरने लगे। हमने उनसे पूछा भी, पर वो मुस्कुरा कर टाल गए। उनकी इस अदा पर हमें मशकूर कन्नौजी का शेर याद आ गया…

अंदर-अंदर कितने ही हम जख्मी हों

चेहरे पर मुस्कान सजानी पड़ती है।

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नये-नवेले लेखक की कागजों की गड्डी

लखनऊ कलम और कला के लिए उर्वरा धरती रही है, आज भी है। पाठक का पता नहीं, पर हर तीसरा शख्स लेखक है। किताबें खूब छपती हैं, पर बिकती नहीं। बिकने की पड़ी भी किसे है। किताबें तो लिखी जा रहीं, ताकि अनुदान पा सकें। वहीं, कुछ का सृजन पुरस्कार रूपी लक्ष्य पर निशाना जैसा है। इसी जुगत में दिमागी कचरे को किताब की शक्ल देने की तैयारी जोर-शोर से है। आखिर आपदा में अवसर का अधिकार तो लेखक वर्ग को भी है। इसी आपदा को आधार बनाकर जो समझ में आया वो लिखकर नये-नवेले लेखक महोदय ने कागजों की गड्डी तैयार की है। दर-दर दस्तक देकर वो गड्डी को फेंट भी रहे हैं। एक प्रकाशक पैसा लेकर किताब छापने को तैयार भी हो गए। प्रकाशक खोजने का पहला चरण तो पूरा हुआ। अब वो दूसरे चरण मतलब अनुदान और पुरस्कार की खातिर चरण वंदना का अभ्यास कर रहे।

(दुर्गा शर्मा)

साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

संगीत के नवांकुरों के नये बहाने

संगीत संस्थानों ने ऑनलाइन कक्षाएं शुरू की हैं। ऑफलाइन क्लास की तरह यहां भी हाजिरी लगती है। शाॅर्ट अटेंडेंस होने पर परीक्षा में न बैठने दिए जाने का डर भी दिखाया जाता है, पर विद्यार्थी हैं कि मानते नहीं। ऑफलाइन से ऑनलाइन हुईं संगीत कक्षाओं में एक रोचक बदलाव दिखा है। वो ये है कि अब कोई भी विद्यार्थी बीमार नहीं पड़ता। क्लास न कर पाने पर बीमारी के विकल्प के तौर पर कई नये बहाने ईजाद हो चुके हैं। अनुपस्थित होने पर अब विद्यार्थी कहता है, नेटवर्क प्राब्लम के कारण क्लास नहीं कर पाए। लाइट न आना, स्लो नेट कनेक्टिविटी समेत अन्य कारण भी गिनाते हैं। टीचर सवाल करे तो जवाब नहीं मिलता। बाद में पूछने पर विद्यार्थी ऑडियो नहीं आ रहा, वीडियो साफ नहीं है…कहकर बचता है। हमारी यही कामना है कि हर कोई यूं ही हमेशा स्वस्थ रहे, पर संगीत के नवांकुरों! आप बेवजह क्लास मत छोड़ें।

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शारीरिक दूरी है कहां!

घुंघरुओं की झंकार से ऑनलाइन मंच गूंज रहे। सामूहिक प्रस्तुतियां भी शुरू हो गई हैं। इसी बहाने कोरोना के कारण आई नीरसता में कुछ रस घुल रहा…अच्छा लग रहा। पर ये क्या! गीत-संगीत की बयार के बीच शारीरिक दूरी का नियम दरकिनार हो रहा। रिहर्सल और रियाज में भी कोई एहतियात नहीं बरत रहा। कहीं नृत्य उत्सव में एक दूसरे के गले का हार बनकर सावन झूम रहा तो कहीं कोई कलाकार बेफिक्री से बाग और पार्क में परफॉर्म कर वीडियो बना रहा। अॉनलाइन मंच पर प्रतिस्पर्धा के चलते सबसे अलग नजर आने की होड़ में कलाकार क्या कुछ नहीं कर रहा। टोकने पर दर्शकों का मनोरंजन कलाकार का धर्म जैसी बातें भी दोहराई जा रहीं। हम आपसे अब भी यही कहेंगे कि महामारी के समय खुद को आला दिखाने और दूसरों के मनोरंजन के लिए अपनी सुरक्षा काे भूल जाना ये तो समझदारी की बात नहीं।

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फिल्म जुनून, सावन और डॉ. योगेश प्रवीन

अवधविद् पद्मश्री डॉ. योगेश प्रवीन ने सावन से जु़ड़ी एक याद साझा की। बहुत कम लोग जानते होंगे कि 1978 में रिलीज श्याम बेनेगल की फिल्म जुनून का अधिकांश हिस्सा लखनऊ में फिल्माया गया। इस फिल्म के चार गानों में से एक गाना डॉ. योगेश प्रवीन ने लिखा। फिल्म को तब सर्वश्रेष्ठ फिल्म का अवार्ड भी मिला। रहीमाबाद में एक कोठी शूटिंग के लिए ली गई थी। फिल्म में दीप्ति नवल और नफीसा अली का झूला झूलने का दृश्य है। इसके साथ सावन गीत जो योगेश प्रवीन ने लिखा था वह आपकी नजर है-“घिर आई काली घटा मतवारी, सावन की आई बहार रे…खिल गए हथेली पे मेहंदी के बूटे,लचकत झूलन से डार रे…।” मुंबईया तड़क-भड़क और अश्लील गीत दृश्य की मांग उन दिनों भी थी। श्याम बेनेगल ने कहा गीत में कुछ ऐसा होना चाहिए तो योगेश प्रवीन बोले, अवध की संस्कृति इससे ज्यादा खुलकर लिखने की इजाजत नहीं देती।

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कलाकारी न चले तो पंडिताई का प्रयोग

वो हरफनमौला कलाकार हैं। इसके अलावा भी उनकी एक स्थायी पहचान है। माथे पर तिलक और होंठों पर चिरपरिचित मुस्कान भर से भी वो पहचान लिए जाते हैं। अभिनय, निर्देशन, गायन, लेखन के अलावा भी उन्हें एक जबरदस्त शौक है- वो है तारीफों के पुल बांधना। जिस चाव से वो अपनी बड़ाई करते हैं, उसी भाव से सामने वाले की प्रशंसा करना भी नहीं भूलते। जहां उनकी कलाकारी काम नहीं आती, वहां पंडिताई का बेजा प्रयोग करते हैं। अपनी इस कवायद से वो कुछ ज्यादा नहीं चाहते, बस उनके काम की चर्चा बनी रहे। कुछ समय से खामोश चल रहे थे। इधर तारीफों के पक्के पुल निर्माण का काम फिर जोरों से शुरू हुआ। हमें समझते देर न लगी कि पंडित जी को कुछ जरूरत आन पड़ी। फिर एक रोज उनके आगामी कार्यक्रम का निमंत्रण भी आ गया। इसी के साथ हमारा अंदेशा भी सही निकला।

दुर्गा शर्मा

लखनऊ।

साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

रुकइया बीवी से इश्क कर “बेदअब” हो गए

जमाने सेे जिस लखनऊ शहर के अदब की मिसाल दी जाती रही है, वहां कोई शायर खुद को ताल ठोककर “बेअदब लखनवी” कहे तो जिज्ञासा लाजिमी है। वो सिर्फ कवि या शायर नहीं, उनके बदन पर खाकी वर्दी भी सजती है। खाकी और कलम का मिलन तो समझ आता है, पर बेअदब लखनवी मेल नहीं खाता। एक रोज हमें जिज्ञासा का कीड़ा कुछ ज्यादा ही काट गया, हमने उनसे पूछ लिया- ये अदब के शहर में आप बेअदब कैसे हो गए। वो बोले, दर्द भरी दास्तान है। फुरसत में अपनी कहानी सुनाकर रुलाएंगे। हमने कहा हम तुरंत सुनने को तैयार हैं। आप तो शायर मिजाज हैं, कुछ उसी अंदाज में अपनी दर्दीली दास्तान कह जाइए। वो बोले-हम बोलकर नहीं, लिखकर बताएंगे। थोड़ी देर बाद उनका मैसेज आया…

राम के वंशज अली हो गए

पीर पैगंबर वली हो गए

इश्क रुकइया बीवी से कर

यारों हम “बेअदब” हो गए।

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द शो मस्ट गो ऑन…

हर बाधा को पार कर रंगमंच हमेशा उठ खड़ा हुआ है। जब तक अभिव्यक्ति, अभिनय करने वाले और दर्शक हैं, तब तक रंगमंच जिंदा है। फिलहाल दर्शक हॉल तक नहीं आ सकते, पर कलाकार तो सीमित संसाधनों में रहकर उन तक पहुंच सकते हैं। इसी सोच के साथ पिछले दिनों भारतेंदु नाट्य अकादमी ने डिजिटल थियेटर की शुरुआत की। मंच पर कलाकार थे और मुंह पर मास्क। शारीरिक दूरी का भी ख्याल रखा गया। फेसबुक पर लाइव शो हुआ। तीन रातों तक ये सिलसिला चला। यकीन जानिए, मास्क लगा होने के बाद भी कलाकारों के चेहरे का भाव देखने वाले तक बखूबी पहुंचा। आवाज का उतार-चढ़ाव भी न बदला। हालांकि, कलाकार अादतन बार-बार दर्शक दीर्घा की ओर देखते, पर कैमरा के सिवा कुछ नजर नहीं आता। वो दोगुनी ऊर्जा से फिर संवाद बोलते। इनका रंगमंच प्रेम हमें समझा गया कि परिस्थितियां कैसी भी हों, द शो मस्ट गो ऑन…।

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फंड रेज तो हो रहा, पर जा कहां रहा

अपने कला संपन्न शहर में कलाकारों के कद्रदानों की भी कोई कमी नहीं। मदद के लिए एक दरकार पर सहायतार्थ हजारों हाथ आगे बढ़ जाते हैं। सहयोग करने को तत्पर समूह भी बन जाते हैं। इमदाद एकत्र करने के नये तरीके भी ईजाद होते हैं। ऑनलाइन फंड रेजिंग प्रोग्राम ऐसा ही एक तरीका है। हर तीसरा आयोजक फंड रेजिंग को हाईलाइट करते हुए ई इंविटेशन देता है। निमंत्रण क्या, सारा जोर आर्थिक सहयोग देने पर रहता है। अब आप कहेंगे, ये तो अच्छी पहल है। कम से कम इससे कोरोना काल में घर पर बैठे जरूरतमंद कलाकारों को हौसला मिलेगा। हमने भी यही सोचा था। मगर कुछ जरूरतमंद कलाकारों से बात हुई तो उनके बिगड़े सुरों ने हमें दोबारा सोचने पर मजबूर किया। उन्होंने पूछा, फंड रेज तो हो रहा, पर जा कहां रहा, हम तक तो नहीं पहुंचा, आखिर जरूरतमंद तो हम भी हैं।

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मानव होना भाग्य, कवि होना सौभाग्य

गीत ऋषि गोपालदास नीरज की पुण्यतिथि (19 जुलाई) पर उनके एक करीबी साहित्य मनीषी से बात चली। बातों ही बातों में वो हमें उस जमाने में ले गए, जब लोग महज नीरज जी की कविताएं सुनने के लिए कई घंटों का लंबा सफर तय करके आते थे। तब मानव होना भाग्य, कवि होना सौभाग्य होता था। मंच, कवि, श्रोता और यहां तक की आयोजक भी साहित्य मर्मज्ञ होते थे। तब श्रोता कविता सुनने आता था, मनोरंजन के लिए नहीं। इसी मनोरंजन और सस्ते हास्य-व्यंग्य ने काव्य पाठ के मंचों को बिगाड़ दिया। मंच गिरने का ही परिणाम है कि आज गंभीर श्रोता भी नहीं हैं। हमने कहा, नाउम्मीद मत होइए। काव्य पाठ का वो दौर जरूर लौटेगा। हमारा इतना भर कहना था कि वो मुंह बिचकाकर बोले, कैसे लौटेगा जब…

न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर

ऐसे भी लोग चले आए हैं मयखाने में।

दुर्गा शर्मा, दैनिक जागरण लखनऊ।