साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

रुकइया बीवी से इश्क कर “बेदअब” हो गए

जमाने सेे जिस लखनऊ शहर के अदब की मिसाल दी जाती रही है, वहां कोई शायर खुद को ताल ठोककर “बेअदब लखनवी” कहे तो जिज्ञासा लाजिमी है। वो सिर्फ कवि या शायर नहीं, उनके बदन पर खाकी वर्दी भी सजती है। खाकी और कलम का मिलन तो समझ आता है, पर बेअदब लखनवी मेल नहीं खाता। एक रोज हमें जिज्ञासा का कीड़ा कुछ ज्यादा ही काट गया, हमने उनसे पूछ लिया- ये अदब के शहर में आप बेअदब कैसे हो गए। वो बोले, दर्द भरी दास्तान है। फुरसत में अपनी कहानी सुनाकर रुलाएंगे। हमने कहा हम तुरंत सुनने को तैयार हैं। आप तो शायर मिजाज हैं, कुछ उसी अंदाज में अपनी दर्दीली दास्तान कह जाइए। वो बोले-हम बोलकर नहीं, लिखकर बताएंगे। थोड़ी देर बाद उनका मैसेज आया…

राम के वंशज अली हो गए

पीर पैगंबर वली हो गए

इश्क रुकइया बीवी से कर

यारों हम “बेअदब” हो गए।

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द शो मस्ट गो ऑन…

हर बाधा को पार कर रंगमंच हमेशा उठ खड़ा हुआ है। जब तक अभिव्यक्ति, अभिनय करने वाले और दर्शक हैं, तब तक रंगमंच जिंदा है। फिलहाल दर्शक हॉल तक नहीं आ सकते, पर कलाकार तो सीमित संसाधनों में रहकर उन तक पहुंच सकते हैं। इसी सोच के साथ पिछले दिनों भारतेंदु नाट्य अकादमी ने डिजिटल थियेटर की शुरुआत की। मंच पर कलाकार थे और मुंह पर मास्क। शारीरिक दूरी का भी ख्याल रखा गया। फेसबुक पर लाइव शो हुआ। तीन रातों तक ये सिलसिला चला। यकीन जानिए, मास्क लगा होने के बाद भी कलाकारों के चेहरे का भाव देखने वाले तक बखूबी पहुंचा। आवाज का उतार-चढ़ाव भी न बदला। हालांकि, कलाकार अादतन बार-बार दर्शक दीर्घा की ओर देखते, पर कैमरा के सिवा कुछ नजर नहीं आता। वो दोगुनी ऊर्जा से फिर संवाद बोलते। इनका रंगमंच प्रेम हमें समझा गया कि परिस्थितियां कैसी भी हों, द शो मस्ट गो ऑन…।

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फंड रेज तो हो रहा, पर जा कहां रहा

अपने कला संपन्न शहर में कलाकारों के कद्रदानों की भी कोई कमी नहीं। मदद के लिए एक दरकार पर सहायतार्थ हजारों हाथ आगे बढ़ जाते हैं। सहयोग करने को तत्पर समूह भी बन जाते हैं। इमदाद एकत्र करने के नये तरीके भी ईजाद होते हैं। ऑनलाइन फंड रेजिंग प्रोग्राम ऐसा ही एक तरीका है। हर तीसरा आयोजक फंड रेजिंग को हाईलाइट करते हुए ई इंविटेशन देता है। निमंत्रण क्या, सारा जोर आर्थिक सहयोग देने पर रहता है। अब आप कहेंगे, ये तो अच्छी पहल है। कम से कम इससे कोरोना काल में घर पर बैठे जरूरतमंद कलाकारों को हौसला मिलेगा। हमने भी यही सोचा था। मगर कुछ जरूरतमंद कलाकारों से बात हुई तो उनके बिगड़े सुरों ने हमें दोबारा सोचने पर मजबूर किया। उन्होंने पूछा, फंड रेज तो हो रहा, पर जा कहां रहा, हम तक तो नहीं पहुंचा, आखिर जरूरतमंद तो हम भी हैं।

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मानव होना भाग्य, कवि होना सौभाग्य

गीत ऋषि गोपालदास नीरज की पुण्यतिथि (19 जुलाई) पर उनके एक करीबी साहित्य मनीषी से बात चली। बातों ही बातों में वो हमें उस जमाने में ले गए, जब लोग महज नीरज जी की कविताएं सुनने के लिए कई घंटों का लंबा सफर तय करके आते थे। तब मानव होना भाग्य, कवि होना सौभाग्य होता था। मंच, कवि, श्रोता और यहां तक की आयोजक भी साहित्य मर्मज्ञ होते थे। तब श्रोता कविता सुनने आता था, मनोरंजन के लिए नहीं। इसी मनोरंजन और सस्ते हास्य-व्यंग्य ने काव्य पाठ के मंचों को बिगाड़ दिया। मंच गिरने का ही परिणाम है कि आज गंभीर श्रोता भी नहीं हैं। हमने कहा, नाउम्मीद मत होइए। काव्य पाठ का वो दौर जरूर लौटेगा। हमारा इतना भर कहना था कि वो मुंह बिचकाकर बोले, कैसे लौटेगा जब…

न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर

ऐसे भी लोग चले आए हैं मयखाने में।

दुर्गा शर्मा, दैनिक जागरण लखनऊ।

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