साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

संगीत के नवांकुरों के नये बहाने

संगीत संस्थानों ने ऑनलाइन कक्षाएं शुरू की हैं। ऑफलाइन क्लास की तरह यहां भी हाजिरी लगती है। शाॅर्ट अटेंडेंस होने पर परीक्षा में न बैठने दिए जाने का डर भी दिखाया जाता है, पर विद्यार्थी हैं कि मानते नहीं। ऑफलाइन से ऑनलाइन हुईं संगीत कक्षाओं में एक रोचक बदलाव दिखा है। वो ये है कि अब कोई भी विद्यार्थी बीमार नहीं पड़ता। क्लास न कर पाने पर बीमारी के विकल्प के तौर पर कई नये बहाने ईजाद हो चुके हैं। अनुपस्थित होने पर अब विद्यार्थी कहता है, नेटवर्क प्राब्लम के कारण क्लास नहीं कर पाए। लाइट न आना, स्लो नेट कनेक्टिविटी समेत अन्य कारण भी गिनाते हैं। टीचर सवाल करे तो जवाब नहीं मिलता। बाद में पूछने पर विद्यार्थी ऑडियो नहीं आ रहा, वीडियो साफ नहीं है…कहकर बचता है। हमारी यही कामना है कि हर कोई यूं ही हमेशा स्वस्थ रहे, पर संगीत के नवांकुरों! आप बेवजह क्लास मत छोड़ें।

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शारीरिक दूरी है कहां!

घुंघरुओं की झंकार से ऑनलाइन मंच गूंज रहे। सामूहिक प्रस्तुतियां भी शुरू हो गई हैं। इसी बहाने कोरोना के कारण आई नीरसता में कुछ रस घुल रहा…अच्छा लग रहा। पर ये क्या! गीत-संगीत की बयार के बीच शारीरिक दूरी का नियम दरकिनार हो रहा। रिहर्सल और रियाज में भी कोई एहतियात नहीं बरत रहा। कहीं नृत्य उत्सव में एक दूसरे के गले का हार बनकर सावन झूम रहा तो कहीं कोई कलाकार बेफिक्री से बाग और पार्क में परफॉर्म कर वीडियो बना रहा। अॉनलाइन मंच पर प्रतिस्पर्धा के चलते सबसे अलग नजर आने की होड़ में कलाकार क्या कुछ नहीं कर रहा। टोकने पर दर्शकों का मनोरंजन कलाकार का धर्म जैसी बातें भी दोहराई जा रहीं। हम आपसे अब भी यही कहेंगे कि महामारी के समय खुद को आला दिखाने और दूसरों के मनोरंजन के लिए अपनी सुरक्षा काे भूल जाना ये तो समझदारी की बात नहीं।

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फिल्म जुनून, सावन और डॉ. योगेश प्रवीन

अवधविद् पद्मश्री डॉ. योगेश प्रवीन ने सावन से जु़ड़ी एक याद साझा की। बहुत कम लोग जानते होंगे कि 1978 में रिलीज श्याम बेनेगल की फिल्म जुनून का अधिकांश हिस्सा लखनऊ में फिल्माया गया। इस फिल्म के चार गानों में से एक गाना डॉ. योगेश प्रवीन ने लिखा। फिल्म को तब सर्वश्रेष्ठ फिल्म का अवार्ड भी मिला। रहीमाबाद में एक कोठी शूटिंग के लिए ली गई थी। फिल्म में दीप्ति नवल और नफीसा अली का झूला झूलने का दृश्य है। इसके साथ सावन गीत जो योगेश प्रवीन ने लिखा था वह आपकी नजर है-“घिर आई काली घटा मतवारी, सावन की आई बहार रे…खिल गए हथेली पे मेहंदी के बूटे,लचकत झूलन से डार रे…।” मुंबईया तड़क-भड़क और अश्लील गीत दृश्य की मांग उन दिनों भी थी। श्याम बेनेगल ने कहा गीत में कुछ ऐसा होना चाहिए तो योगेश प्रवीन बोले, अवध की संस्कृति इससे ज्यादा खुलकर लिखने की इजाजत नहीं देती।

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कलाकारी न चले तो पंडिताई का प्रयोग

वो हरफनमौला कलाकार हैं। इसके अलावा भी उनकी एक स्थायी पहचान है। माथे पर तिलक और होंठों पर चिरपरिचित मुस्कान भर से भी वो पहचान लिए जाते हैं। अभिनय, निर्देशन, गायन, लेखन के अलावा भी उन्हें एक जबरदस्त शौक है- वो है तारीफों के पुल बांधना। जिस चाव से वो अपनी बड़ाई करते हैं, उसी भाव से सामने वाले की प्रशंसा करना भी नहीं भूलते। जहां उनकी कलाकारी काम नहीं आती, वहां पंडिताई का बेजा प्रयोग करते हैं। अपनी इस कवायद से वो कुछ ज्यादा नहीं चाहते, बस उनके काम की चर्चा बनी रहे। कुछ समय से खामोश चल रहे थे। इधर तारीफों के पक्के पुल निर्माण का काम फिर जोरों से शुरू हुआ। हमें समझते देर न लगी कि पंडित जी को कुछ जरूरत आन पड़ी। फिर एक रोज उनके आगामी कार्यक्रम का निमंत्रण भी आ गया। इसी के साथ हमारा अंदेशा भी सही निकला।

दुर्गा शर्मा

लखनऊ।

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