साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

दौड़ती-भागती जिंदगी के बीच भागता कथक

जिक्र चाहे कथक का हो या कथकाचार्यों की बात चले, जेहन में सबसे पहला नाम लखनऊ का आता है। वरिष्ठ कथक गुरु की बात पर शत प्रतिशत सहमति जताते हुए हमने आगे जोड़ा- कथक जगत में लखनऊ सिरमौर था, है और आगे भी रहेगा। उन्होंने यहीं पर हमें रोक दिया और बोलीं- था और है तक तो ठीक है, पर आगे भी रहेगा, कह नहीं सकते। जिन कथक गुरुओं को याद किया जाता है, जिन्हें देश-दुनिया में पहचाना जाता है, वो पुराने नाम ही हैं। इसमें कोई नया नाम जुड़ा हो तो बताइए। हमें कोई ऐसा नया कलाकार बताइए जिसमें लखनऊ कथक घराने के वैभव को आगे ले जाने की संभावना ही नजर आती हो। वो खुद आगे जा रहे, पर लखनवी कथक पीछे छूट रहा। वो लखनवी कथक जिसकी पहचान नजाकत और नफासत है। दौड़ती-भागती जिंदगी के बीच कथक भी भाग रहा, वो ठहराव कहीं गुम हो गया है।

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कोरे किस्सों से भरा ज्ञानकोष

हिंदी और पंजाबी साहित्य में जिस नाम को शिद्दत से याद किया जाता है, वो हैं-पद्म विभूषण, पद्मश्री, साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुस्कार से सम्मानित लेखिका अमृता प्रीतम। साहित्य की एक परंपरा है- यूं हम किसी भी बड़े नाम को साल भर भूले रहें, पर जयंती और पुण्य तिथि पर उससे संबंधित ज्ञान जरूर उमड़ता है। सम्मानित लेखिका अमृता प्रीतम की जयंती (31 अगस्त) पर भी कुछ ऐसा ही हुआ। एक सज्जन ने अमृता प्रीतम के बारे में कहानियों का खजाना खोला। उस खजाने में लेखिका अमृता प्रीतम नदारद थीं। सज्जन के ज्ञानकोष से अमृता प्रीतम और साहिर लुधियानवी की कहानी निकली। हमने कहा ये छोड़िए, कुछ और बताइए तो वो लेखिका के साथ इमरोज को ले आए। हमने बोला, उनकी कलम को याद कीजिए, उस पर बात कीजिए, तो वो एक पल सोचने लगे। हम जान गए महोदय का ज्ञानकोष सिर्फ सुने सुनाए कोरे किस्सों-कहानियों से ही भरा है।

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वीडियो संदेश के जरिए सरकार से सवाल

संगीत साधना और सेवा है, पर भूखे पेट तो भजन भी नहीं होता, फिर सुर-ताल कैसे सजे? एक कलाकार ने वीडियो संदेश के जरिए सरकार से कई सवाल किए हैं। उनके सवाल लाजिमी भी हैं, साथी कलाकार इसका समर्थन भी कर रहे। वीडियाे में कहा गया है कि देश भर में संगीत के तमाम संस्थान हैं। हर संस्थान के पास कार्यक्रम का बजट भी होता है। कोरोना काल में कोई कार्यक्रम तो हो नहीं रहे और आगे कुछ महीनों तक कार्यक्रम होने की गुंजाइश भी नहीं लग रही। ऐसे में वो बजट कहां है? वो बजट कलाकारों के कल्याण में क्यों नहीं लगाया जा सकता? पांच महीने से किसी कलाकार ने कोई कार्यक्रम नहीं किया, पैसे कहां से कमाएंगे? क्या खाएंगे, बच्चों को कैसे पढ़ाएंगे। कलाकार सिर्फ पोस्टर पर छपने के लिए नहीं होते। अगर कला संस्कृति को जिंदा रखना कलाकार का काम है, तो आपका भी दायित्व है।

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पाठक कम न हों… पत्रिकाएं बंद न हों

धन का पता नहीं, पर कलम संतोष प्राप्ति का उपक्रम जरूर है। कलमजीवियों से संतोषी भी और कोई नहीं। कोरोना काल में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में एक सज्जन के बड़े-बड़े लेख छप रहे। ऐसे वैसे लेख नहीं, शोधपरक कला केंद्रित लेख। वो अपने लेखों में कला जगत की विभूतियों से लेकर विभन्न नृत्य शैलियों के बारे में विस्तृत जानकारी भी देते। अपने लेख को समृद्ध करने के लिए खूब पढ़ते और अनुभवी लोगों से संवाद भी करते। हमने पूछा, लेख के लिए इतना परिश्रम करते हैं, मेहनताना भी मिल रहा या नहीं? वो बड़ी विनम्रता के साथ बोले- कोरोना ने हर चीज को ऑनलाइन कर दिया। पत्रिकाएं बंद हो रहीं, ई बुक लॉन्च हो रहे। बंद होती पत्रिकाओं के बीच लेख के लिए मेहनताना कौन देगा? हमने हैरानगी के साथ कहा- फिर लिख क्यों रहे? उन्होंने कहा- हम लिख रहे ताकि पत्रिकाओं के पाठक कम न हों। पत्रिकाएं बंद न हों।

दुर्गा शर्मा

दैनिक जागरण लखनऊ

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