कलाकार महोदय का कायाकल्प
कोरोना काल में कलाकार महोदय ने अपना कायाकल्प ही कर डाला। शूटिंग थी बंद और कोई काम-धाम था नहीं तो जनाब ने अपने शरीर को ही काम पर लगा दिया। रात-दिन एक करके वजन घटा ही लिया आखिर और सींग कटाकर हो गए बछड़ों की लिस्ट में शामिल। अब सबको फ्री की हेल्थ टिप्स बांट रहे हैं। वैसे अंदर की खबर ये है कि किसी मोहतरमा ने उनके बढ़े हुए पेट पर कभी चुटकी लेते हुए कहा था कि “आपके पहुंचने से पहले तो आपका पेट पहुंच जाता है।” फिर क्या था जनाब ने दिल पर ले ली बात और पेट गायब करके ही माने। अब मोहतरमा के साथ उनकी बात कहां तक पहुंची पता नहीं, लेकिन वजन को अपनी हद में जरूर पहुंचा दिया। नाराज न होइएगा, वैसे असल क्रेडिट तो मोहतरमा को ही दिया जाना चाहिए। न वो टोकतीं, न भैया जी दुबलाते । भैया जी स्माइल प्लीज…।
—-
दुधबोली की हिचकिचाहट
दुधबोली यानी वो भाषा जिसमें हमने तुतलाकर पहले पहल अपने आस-पास की दुनिया से संवाद कायम करना शुरू किया। बचपन छूटता गया और हम दुधबोली के संग ही देश-दुनिया की तमाम भाषाओं के साथ जुड़ गए। अन्य भाषाओं के साथ हम ऐसा जुड़े कि दुधबोली कहीं पीछे रह गई। जिस भाषा और बोली को हम समझ तो लेते हैं, पर बोलने में हिचकिचाहट होने लगी। इसी हिचकिचाहट के साथ दुधबोली में कवि सम्मेलन का ऑनलाइन मंच सजा। एक भी युवा चेहरा नहीं दिखा। लगा दुधबोली सिर्फ बुजुर्गों के लिए है। मगर दुधबोली में काव्य पाठ के लिए वरिष्ठों को भी किताब या कागज में लिखी कविता को सामने रखना पड़ा। कुछ ने हिंदी की पहुंच ज्यादा कहकर दुधबोली में अपना वक्तव्य नहीं रखा। चलिए, कोई बात नहीं। सुखद ये रहा कि कम से कम दुधबोली में आयोजन तो हुआ। हर किसी ने अपने स्तर पर भरसक प्रयास तो किया।
—-
स्क्रिप्ट तो अलग होती, पर नृत्यांगना वही
कोरोना काल में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नित नये कलाकार उभर रहे। उभरती हुई प्रतिभाओं को प्रमोट करने वालों की भी कोई कमी नहीं और ऐसा करना भी चाहिए। बात-बात पर खुद को कलाकारों का मसीहा बताने वाले साहब भी आजकल इसी पुण्य काम में लगे हैं। एक बाल नृत्यांगना की तारीफ में कसीदे पढ़ने और लंबे-लंबे प्रेस नोट लिखने में उनके दिन-रात एक हो रहे। हर दूसरे दिन वाट्सएप पर खर्रा आ जाता। हर बार स्क्रिप्ट तो अलग होती, पर नृत्यांगना वही। आपदा में छिपा कोई भी अवसर वो नहीं छोड़ते। कोरोना जागरूकता गीत हों या राम भजन…बच्ची को प्रस्तुति के लिए प्रोत्साहित करते हैं। अब बच्ची इतनी मेहनत करे और अखबार में फोटो न छपे, ऐसा तो हो नहीं सकता। फोटो आते ही बच्ची की मम्मी के चेहरे की चमक दोगुनी हो जाती है, जिसे देखकर महोदय को अपने हिस्से की पूंजी मिल जाती है।
—-
आवाज खोलने के चक्कर में आधा दम निकल गया
कुछ सुनाई नहीं दे रहा। आवाज खोलिए जनाब…। इस गुजारिश को सुनकर वो पहले से भी तेज आवाज में बोलने लगे। अभी भी कुछ सुनाई नहीं दे रहा, आवाज खोलिए…। उन्होंने अपनी आवाज और बुलंद कर दी। बुजुर्गवार अबाध गति से काव्य की अविरल धारा बहाते रहे, पर लोगों को कुछ भी सुनाई नहीं दिया। आवाज खोलिए-आवाज खोलिए भी होता रहा। तभी होस्ट ने संदेश को और स्पष्ट करते हुए कहा, एप का ऑडियो खोलिए जनाब। कविवर को संदेश समझ में अा गया, उन्होंने एप के ऑडियो पर क्लिक किया, तब जाकर उनका काव्यपाठ हर किसी को सुनाई दिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- ऑफलाइन कवि को ऑनलाइन महफिल में आना भारी पड़ गया। आवाज खोलने के चक्कर में हमारा आधा दम निकल गया। बचे-खुचे दम से अब बाकी कविता सुनाएंगे। श्रोता बोले, शुरू कीजिए साहब, आपके साथ हम भी दम लगाएंगे, जोरदार ताली बजाएंगे।
दुर्गा शर्मा, दैनिक जागरण
(लखनऊ)
