साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

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समझने वाले समझ गए हैं

व्यंग्य विसंगतियों से साक्षात्कार कराता है। व्यंग्य की जितनी भूमिका साहित्य में है, उससे कहीं ज्यादा समाज में। व्यंग्य आईना लेकर चलता है। आईना लेकर चलना कोई सरल काम भी नहीं, टूटने का डर बना रहता है, इसलिए भी व्यंग्यकारों को तमाम एहतियात का ध्यान रखना पड़ता है। वाे लड़ते भी हैं, पर हाथ में तलवार नहीं होती। जुबानी तीर चलते हैं, समझने वाला उसकी दिशा भांप लेता है। ठीक वैसे ही जैसे पढ़ने वाला व्यंग्यकार की दृष्टि और संकेतों की भाषा में छिपा अर्थ समझ लेता है। विसंगति से मुठभेड़ करने वाले व्यंग्यकार जब आपस में उलझते हैं तो भी अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ते। संकेतों में ही कलह परवान चढ़ती है। जो स्पष्ट शब्दों में जंग छेड़ दे, फिर वो व्यंग्यकार ही कहां। खैर, आप करते रहिए आंखों ही आंखों और इशारों में बात, समझने वाले समझ गए हैं- व्यंग्यकार बंधु उलझ गए हैं।

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संगीत सेवा कैसे होगी!

उन्होंने पूछा- …और क्या चल रहा है? हमने कहा- दो ही चीजें चल रहीं हैं आजकल- पहला इम्युनिटी बढ़ाओ और दूसरा आत्मनिर्भर बनो। हम भी इन्हीं दोनों के बीच विचरण कर रहे। उन्होंने कहा- इम्युनिटी की पाठशाला तो खूब चल रही। आप हमें आत्मनिर्भर बनने के कुछ तरकीब सुझाइए। तरकीब ऐसी हो कि संगीत की सेवा भी हो जाए और हम आत्मनिर्भर भी बन जाएं। हमने कहा- शर्त के साथ सेवा कहां होती है? वो बोले- कोरोना ने सब बदल दिया है तो संगीत सेवा के क्षेत्र में भी कुछ बदलाव लाजिमी है। भूखे पेट तो भजन भी नहीं होता है, संगीत सेवा कैसे होगी। उनकी बात में दम था। उन्होंने हमें सोचने पर मजबूर किया कि ऑनलाइन मंच पर गाना-बजाना तो खूब हो रहा, पर वो किसी भी तरह से संगीत सेवा नहीं। यूं ही चलता रहा तो कहीं संगीत सेवकों की प्रजाति लुप्त न हो जाए।

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खरी-खोटी सुनाता था, पर शायर अच्छा था

अपनी शायरी से सत्ता को ललकारने वाली आवाज ने हमेशा के लिए चुप्पी साध ली। युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक की महफिल बेनूर हो गई। अपनी बुलंद आवाज से मंच पर आते ही लोगों को खामोश कर देने वाले खुद मौन हो गए। उनकी शायरी का बढ़ता प्रभाव उन्हें बॉलीवुड तक खींच लाया था। न जाने कितने ही गीत उनकी कलम से निकलकर लोगों की जुबान पर चढ़ गए। शायरी का अलग अंदाज-ए-बयां थे राहत इंदौरी। काव्य जगत के कुछ चेहरे उन्हें शायर कम मदरसा छाप ज्यादा बताकर उनसे बेहतर लिखने और कहने का दम भर रहे। कुछ ऐसे कविवर भी हैं, जिन्होंने उन्हें जहर उगलने की मशीन बताकर पूरी कविता ही तैयार कर डाली। धड़ाधड़ पोस्ट कर उनके मौत का जश्न मनाने की अपील भी की। हम आपसे बस यही कहेंगे कि खरी-खोटी सुनाता था, पर शायर अच्छा था। आपने उन्हें वैसा देखा जैसा आपका चश्मा था।

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आराध्य के साथ हंसी-ठिठोली करते कलाकार

दुर्गा शर्मा)

संगीत ईश्वरीय उपादान है। कभी-कभी संगीत स्वयं ईश्वर ही हो जाता है। दोनों के बीच का भेद मिट जाता है। तभी तो हमारे कलाकार लोकगीतों में अाराध्य के साथ हंसी-ठिठोली और छेड़छाड़ भी कर लेते हैं। पग घुंघरू बांध थिरकते भी हैं। उपास्य के दास, सखा, सेवक यहां तक कि स्वामी भी बन सकते हैं। पर अनेक रूपों में आराध्य से प्रेम करने का ये संबंध आपको समझ नहीं आता। आप तो श्रीकृष्ण रूप में सजे कलाकार को देखकर सवाल दागते हैं कि कान्हा क्या मूंछ भी रखते हैं? फिर ठहाका लगाकर पूछते हैं, ये अाप लोग आए दिन त्योहार क्यों मनाते हैं? गम के समय में भी आनंद की नदी में डुबकी कैसे लगाते हैं? हमें आपको कोई जवाब नहीं देना, क्योंकि जहां आस्था होती है वहां सवाल-जवाब नहीं होते। भक्त और भगवान के बीच की इस वैचारिक स्वतंत्रता को आप नहीं समझ सकते।

दुर्गा शर्मा (लखनऊ)

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