साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

लखनऊ के स्मार्ट व्यंग्यकार

लखनऊ के व्यंग्यकार सिर्फ लेखन में नहीं, देखन में भी सबसे आगे हैं। ये दावा युवा व्यंग्यकारों की आपसी सहमति है। व्यंग्यकार साथी के जन्मदिन पर व्यंग्य विभूषण का ऑनलाइन प्रेम बरसा। व्यंग्य विभूषण ने ‘जनहित में जारी’ कर कहा- ‘आज लखनऊ के व्यंग्य घराने के सबसे स्मार्ट व्यंग्यकार का जन्मदिन है। ‘ इस पर साथी ने ‘ जीजा-साली ‘ की पुरानी कहानी याद दिलाई। हुआ कुछ यूं था कि फेसबुक पर जब दोनों के बीच स्मार्टनेस का सर्वे हुआ तो दूसरे दोस्त की साली मैदान में उतर आईं और ‘ डंके की चोट पर’ जीजा को सबसे स्मार्ट बताया। इससे पहले की तलवारें खिंच जातीं, जीजा ने साली को यह कहते हुए शांत कराया था कि इस आंदोलन से उनकी मेल फैन फॉलोविंग घट सकती है। खैर, आज जब एक दूसरे का गला काटने के ‘सभी विकल्प खुले हुए हैं’ तब किसी को स्मार्ट कहने वाली यह लखनवी मोहब्बत बनी रहे।

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सकारात्मक सुरमयी संवाद

एक सच्चा संगीत साधक वही, जो किसी भी परिस्थिति में सुरों का साथ न छोड़े। संगीत में उसके प्राण बसे। वो जहां हो, साज़ की मिठास घुलती रहे, फिर चाहे वो घर हो या अस्पताल का बेड। दूसरे राज्य की एक वरिष्ठ कलाकार को कोरोना के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। चारों ओर अजीब सी खामोशी लगी तो वरिष्ठ कलाकार ने अस्पताल से ही अपना गीत रिकॉर्ड कर शुभचिंतकों से पूछा- ये चुप सी क्यों लगी है, अजी कुछ तो बोलिए … । बस फिर क्या था, उनका फोन लगातार घनघनाता रहा। शहर की संगीत विदुषी ने भी वरिष्ठ कलाकार का हाल चाल लिया। जल्द ठीक होने की सुरीली बधाई भी दी। कोरोना काल में दो वरिष्ठ संगीत साधकों के बीच सुरमयी संवाद ने सकारात्मक का संचार किया। आखिरकार वरिष्ठ कलाकार ने कोरोना को मात दी और इस बात को फिर सिद्ध किया कि संगीत किसी औषधि से कम नहीं।

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रंगमंच की पाठशाला के अजब नियम से वार-पलटवार

रंगमंच की पाठशाला में कुर्सी के लिए जोर का तोड़ हो रखा है। पाठशाला के संविधान के अनुसार क्लर्क प्रबंधक, प्रबंधक सहायक निदेशक तो सहायक निदेशक कार्यवाहक बन सकता है। यहां तकनीकी पदों के अनुरूप डिग्री, डिप्लोमा छोड़िए सर्टिफिकेट भी नहीं है, फिर भी काम चल रहा। जिम्मेदार लोगों के नाम पर सिर्फ क्लर्क और बाबू ही हैं और ये पाठशाला की ऊंची कुर्सी के लिए एक-दूसरे पर पीठ पीछे से वार करा रहे। फिलहाल चार वर्षों से ऊंची कुर्सी पर काबिज साहब निशाने पर हैं। साहब परेशान हैं कि पाठशाला के अतिथि वरिष्ठजन जब तक आदान-प्रदान ठीक चला तो उनके आंगन में खूब खेले, पर अब पाला बदले है। ध्वनि-प्रकाश उपकरण के लिए नियुक्त लोगों को न उपकरण जानते है और न नियुक्त लोग उपकरणों को। सब नेतागीरी में रमे हैं। पाठशाला से प्रशिक्षित छात्र अपनी सेवा देना चाहें तो नेताजी लोग रास्ता बंद किए है।

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एक नहीं, कई लकीरें नई खींची जा रहीं

शास्त्रीय संगीत को समर्पित वाट्सएप ग्रुप पर रोचक चर्चा चली। सज्जन ने मुद्दा उठाया- लकीर , कोई नई खिंचेगी? उनका इतना पूछना था कि जवाबों और विचारों की बाढ़ सी आ गई। एक ने कहा- लकीर तो नई खींची जा ही रही है मान्यवर। अभिभावकों की जो पीढ़ी अपनी नई पीढ़ी को मोबाइल का दास बताकर निकम्मा करार देती थी, अब वे स्वयं भी टेक्नोलॉजी संपन्न होने की दिशा में जद्दोजहद कर रहे। कलाकार जिस इंटरनेट से दूर रहने की बात करते थे, अब उसी से दाल रोटी चला रहे। जो लाखों की पेटी रखवा कर मंच पर चढ़ते थे, वे भी मुफ्त सिखा रहे। एक दिन में चार नगरों में प्रवास करने वाले भी महीनों से घर बैठे हैं। एक नहीं, कई लकीरें नई खींची जा रही हैं। इस जवाब से उत्तरदाता ने इतनी बड़ी लकीर खींच दी कि प्रश्न पूछने वाला ही निरुत्तर हो गया।

दुर्गा शर्मा

दैनिक जागरण लखनऊ

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