हमार लल्ला नेता बनिहै या अभिनेता
बोर्ड परीक्षा परिणामों में नंबर बरस रहे। एक को तो शत प्रतिशत अंक भी मिले। मेधावियों पर चर्चा चली तो एक लोकल स्टार को अपने स्कूल के दिन याद अाए। वो बोले, पढ़ाई तो हम भी करते थे, पर शायद अंक हमारे पास आने से डरते थे। पास होने के लिए लगाया हर गणित फेल हो जाता था। हिंदी छोड़, हमें तो हर विषय डराता था। रिजल्ट आने के बाद हर कोई लताड़ लगाता और हमारी अम्मा से यही कहता, इन कम नंबरों के साथ ये जिंदगी में कुछ भी नहीं कर पाएगा। हमारी अम्मा जवाब देतीं, देख लीओ…हमार लल्ला नेता बनिहै या अभिनेता। बोलन में भी तो देखो कइसन धाकड़ है। नेता अऊर अभिनेता बनै का खातिर पढ़ाई थोड़ी लगत है। अम्मा हमारे हुनर को बचपन में ही पहचान गईं। आप भी नंबरों के चक्कर में मत पड़िए। हमारी अम्मा की तरह अपने बच्चे को मन का करने दीजिए।
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समूह चित्र की आदत
कोरोना काल में हर कोई डिजिटल मंच का खूब प्रयोग कर रहा। संक्रमण के बढ़े खतरे के बीच जिंदगी पुरानी रफ्तार पाने लगी है। साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों ने भी नया मंच खोज लिया है। घर पर ही सेटअप लगाकर लाइव कार्यक्रम हो रहे। कहने को भी हो जाता है कि संक्रमण से बचाव के लिए जारी गाइडलाइन का पालन करते हुए कार्यक्रम ऑनलाइन हो रहा। पर ऑनलाइन कार्यक्रम के लिए आयोजन स्थल पर ऑफलाइन जुड़ने वाले लोगों की संख्या हैरान करती। ऊपर से कार्यक्रम खत्म होने के बाद समूह चित्र लेने की आदत भी नहीं छूट रही। फ्रेम से बाहर न हो जाएं, इस डर से हर कोई एक दूसरे से सटकर खड़ा भी दिखता है। फोटो बिना काम भी कहां चलता है। सोशल मीडिया पर पोस्ट भी तो करना होता है। हम आपसे बस यही कहेंगे, बुद्धिजीवी होने का कुछ तो परिचय दीजिए।
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टिडि्डयों के हमला बोल कार्यक्रम पर कविता और गीत
कोई तय कार्यक्रम नहीं था। अचानक ही लखनऊ से टिडि्डयों का काफिला गुजरा। किसी ने कहा टिडि्डयों के झुंड ने हमला कर दिया, जैसे खूंखार अपराधियों का गिरोह हो कोई। टिडि्डयों के एनकाउंटर के लिए पुलिस को फोन भी तो किया। कोई इसे ऊपरवाले का कहर बता गया। वहीं, कइयों को टिडि्डयों के साथ सेल्फी न लेने का मलाल सता गया। ताली बजाई, थाली पीटा, ढोलक और मंजीरा भी निकला। टिडि्डयों का दल ज्यादा देर नहीं ठहरा, लेकिन ढोलक और मंजीरा बाहर आ ही गया तो एक लाेकगीत और शास्त्रीय कलाकार ने आपदा को अवसर में बदलने का मन बनाया। टिडि्डयों के अप्रत्याशित हमला बोल कार्यक्रम को केंद्र में रखकर गीत रच डाला। शिव भजन और टिडि्डयों का आतंक… कलाकार ने क्या खूब रचा! वहीं, कुछ ने टिडि्डयों के दल पर कविता का अवधी पंच मारा। टिड्डी दल तो निकल गया, पर उस पर रचनात्मकता जारी है।
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संगीत की बगिया के विद्यार्थियों का सुर बदला
संगीत को कोई बांध नहीं सकता, पर संगीत शिक्षा को जरूर नियमों में जकड़ा जा सकता है। शहर की सुरमयी बगिया तो इसी बात की तस्दीक कर रही। यहां कभी भी कोई नियम लागू हो सकता है। ऐसा ही एक नियम ऑनलाइन क्लासेज को लेकर भी आया। फरमान जारी हुआ कि जो शिक्षक संविदा पर काम कर रहे, वो नये सत्र की कक्षाएं शुरू कर दें। अब समस्या ये कि जब तक पुरानी क्लास के विद्यार्थी पास होकर नयी कक्षा में नहीं आएंगे, तब तक नया सत्र कैसे शुरू होगा। दाखिले संबंधी प्रक्रिया भी तो नहीं पूरी हुई है। खैर, समस्या का समाधान निकला और संविदा पर तैनात शिक्षकों के विद्यार्थियों को प्रमोट किए जाने का संदेश जारी हो गया। अब संगीत के विद्यार्थियों का सुर गूंज रहा कि काश! हम भी स्थायी की जगह संविदा शिक्षक से ही पढ़ रहे होते। बिना परीक्षा के प्रमोट तो हो जाते।
(दुर्गा शर्मा, दैनिक जागरण, लखनऊ)







