साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

हमार लल्ला नेता बनिहै या अभिनेता

बोर्ड परीक्षा परिणामों में नंबर बरस रहे। एक को तो शत प्रतिशत अंक भी मिले। मेधावियों पर चर्चा चली तो एक लोकल स्टार को अपने स्कूल के दिन याद अाए। वो बोले, पढ़ाई तो हम भी करते थे, पर शायद अंक हमारे पास आने से डरते थे। पास होने के लिए लगाया हर गणित फेल हो जाता था। हिंदी छोड़, हमें तो हर विषय डराता था। रिजल्ट आने के बाद हर कोई लताड़ लगाता और हमारी अम्मा से यही कहता, इन कम नंबरों के साथ ये जिंदगी में कुछ भी नहीं कर पाएगा। हमारी अम्मा जवाब देतीं, देख लीओ…हमार लल्ला नेता बनिहै या अभिनेता। बोलन में भी तो देखो कइसन धाकड़ है। नेता अऊर अभिनेता बनै का खातिर पढ़ाई थोड़ी लगत है। अम्मा हमारे हुनर को बचपन में ही पहचान गईं। आप भी नंबरों के चक्कर में मत पड़िए। हमारी अम्मा की तरह अपने बच्चे को मन का करने दीजिए।

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समूह चित्र की आदत

कोरोना काल में हर कोई डिजिटल मंच का खूब प्रयोग कर रहा। संक्रमण के बढ़े खतरे के बीच जिंदगी पुरानी रफ्तार पाने लगी है। साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों ने भी नया मंच खोज लिया है। घर पर ही सेटअप लगाकर लाइव कार्यक्रम हो रहे। कहने को भी हो जाता है कि संक्रमण से बचाव के लिए जारी गाइडलाइन का पालन करते हुए कार्यक्रम ऑनलाइन हो रहा। पर ऑनलाइन कार्यक्रम के लिए आयोजन स्थल पर ऑफलाइन जुड़ने वाले लोगों की संख्या हैरान करती। ऊपर से कार्यक्रम खत्म होने के बाद समूह चित्र लेने की आदत भी नहीं छूट रही। फ्रेम से बाहर न हो जाएं, इस डर से हर कोई एक दूसरे से सटकर खड़ा भी दिखता है। फोटो बिना काम भी कहां चलता है। सोशल मीडिया पर पोस्ट भी तो करना होता है। हम आपसे बस यही कहेंगे, बुद्धिजीवी होने का कुछ तो परिचय दीजिए।

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टिडि्डयों के हमला बोल कार्यक्रम पर कविता और गीत
कोई तय कार्यक्रम नहीं था। अचानक ही लखनऊ से टिडि्डयों का काफिला गुजरा। किसी ने कहा टिडि्डयों के झुंड ने हमला कर दिया, जैसे खूंखार अपराधियों का गिरोह हो कोई। टिडि्डयों के एनकाउंटर के लिए पुलिस को फोन भी तो किया। कोई इसे ऊपरवाले का कहर बता गया। वहीं, कइयों को टिडि्डयों के साथ सेल्फी न लेने का मलाल सता गया। ताली बजाई, थाली पीटा, ढोलक और मंजीरा भी निकला। टिडि्डयों का दल ज्यादा देर नहीं ठहरा, लेकिन ढोलक और मंजीरा बाहर आ ही गया तो एक लाेकगीत और शास्त्रीय कलाकार ने आपदा को अवसर में बदलने का मन बनाया। टिडि्डयों के अप्रत्याशित हमला बोल कार्यक्रम को केंद्र में रखकर गीत रच डाला। शिव भजन और टिडि्डयों का आतंक… कलाकार ने क्या खूब रचा! वहीं, कुछ ने टिडि्डयों के दल पर कविता का अवधी पंच मारा। टिड्डी दल तो निकल गया, पर उस पर रचनात्मकता जारी है।

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संगीत की बगिया के विद्यार्थियों का सुर बदला

संगीत को कोई बांध नहीं सकता, पर संगीत शिक्षा को जरूर नियमों में जकड़ा जा सकता है। शहर की सुरमयी बगिया तो इसी बात की तस्दीक कर रही। यहां कभी भी कोई नियम लागू हो सकता है। ऐसा ही एक नियम ऑनलाइन क्लासेज को लेकर भी आया। फरमान जारी हुआ कि जो शिक्षक संविदा पर काम कर रहे, वो नये सत्र की कक्षाएं शुरू कर दें। अब समस्या ये कि जब तक पुरानी क्लास के विद्यार्थी पास होकर नयी कक्षा में नहीं आएंगे, तब तक नया सत्र कैसे शुरू होगा। दाखिले संबंधी प्रक्रिया भी तो नहीं पूरी हुई है। खैर, समस्या का समाधान निकला और संविदा पर तैनात शिक्षकों के विद्यार्थियों को प्रमोट किए जाने का संदेश जारी हो गया। अब संगीत के विद्यार्थियों का सुर गूंज रहा कि काश! हम भी स्थायी की जगह संविदा शिक्षक से ही पढ़ रहे होते। बिना परीक्षा के प्रमोट तो हो जाते।

(दुर्गा शर्मा, दैनिक जागरण, लखनऊ)

शिव के रहते कैसी चिंता…♥️

महादेव का मनन करें, जन कल्याण से जुड़ें 🍃

रिमझिम फुहारें, चारों ओर हरियाली, बम भोला की गूंज और नृत्य करता मन मयूर…बताने की जरूरत नहीं कि सावन का महीना आ गया। पर्यावरण और अध्यात्म दोनों ही वजह से सावन का विशेष महत्व है। सांस्कृतिक विरासत के तौर पर भी ये महीना समृद्ध है। वैसे तो सावन की महत्ता बताने के लिए कई कहानियां हैं। सभी कहानियों का सार यही है कि सावन महीना पूर्णतया भगवान शिव की आराधना का महीना है। हर कोई देवों के देव को प्रसन्न करने का प्रयास करता है। कावड़ यात्रा निकलती है। कावड़ यात्रा का अाध्यात्मिक आशय शिव के साथ विहार करना है। भगवान शिव के साथ विहार का सौभाग्य उसी को मिलता है, जो सात्विकता और संयम नियम का पालन करे। हालांकि, कोरोना के कारण फिलहाल कावड़ यात्रा नहीं कर सकते, पर शिवोपासना के तरीके अनेक हैं। उपासना का सही अर्थ यही है कि हम अपने आराध्य देव के गुणों को भी आत्मसात करने का प्रयास करें। उनके गुणों को अंगीकार करने से बचेंगे तो प्रभु की कृपा कैसे प्राप्त करेंगे। सावन माह में कल्याणकारी स्वरूप में पूजे जाने वाले एक मात्र लोक देवता महादेव, जो प्रत्येक शिव भक्त को कल्याणकारी रूवरूप की प्रेरणा देने वाले हैं। चातुर्मास में जब भगवान विष्णु शयन के लिए चले जाते हैं, तब भोले भंडारी तीनों लोकों की सत्ता संभालते हैं। इस पवित्र माह में शिव जी ने कामदेव को भस्म किया था। सावन में ही गंगा का अवतरण शिव की जटाओं के माध्यम से संभव हुआ था। इसी माह में संपूर्ण जगत कल्याण के लिए समुद्र मंथन से निकले विष को पी लिया था और नीलकंठ कहलाए। शिव तत्व ही सत्य है, कल्याणकारी है और सुंदर भी है। शिव प्रकृति में रमने वाले देव हैं। प्रकृति के तीनों तत्वों को सत, तम और रज को धारण करने वाले, करुणावतार हैं। हमें भी प्रकृति से प्रेम करना आना चाहिए। इस माह में अनेक व्रत और त्योहार पड़ते हैं। ये पर्व हमें प्रकृति के करीब भी ले जाते हैं, जैसे हरियाली तीज। पर्यावरण की दृष्टि से भी हरियाली तीज का विशेष महत्व है। इस दिन पौधारोपण के अभियान भी चलाए जाते हैं। ये शिव उपासना के साथ ही पर्यावरण रक्षा का संकल्प लेने का भी महीना है। ये संयम का भी महीना है। खासकर खानपीन का संयम। धार्मिक कारणों के अलावा वैज्ञानिक दृष्टि से भी इन दिनों तामसिक भोजन जैसे मांस-मदिरा का सेवन हानिकारक होता है। संयमित रहें, भक्ति भाव के साथ कल्याणकारी कार्यों को भी संपादित करें। यही भगवान शिव की सबसे बड़ी पूजा होगी। इस कल्याण की संस्कृति को जन कल्याण से जोड़े और शिव का मनन करें।

(दुर्गा शर्मा, लखनऊ)

कॉलम : कलाकारी

नाट्य अकादमी के साथ ये कैसा नाटक!
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बाद रंगमंच प्रशिक्षण के लिए सबसे प्रतिष्ठित सरकारी संस्था भारतेंदु नाट्य अकादमी हमारे शहर में है। ये लखनऊ और लखनऊ वालों के लिए गर्वित होने का विषय हो सकता है, पर ऐसा है नहीं। कम से कम अकादमी के मौजूदा हालात तो गर्व करने का मौका बिल्कुल नहीं दे रहे। हाल ही में यहां बचीं एकमात्र पूर्णकालिक प्रशिक्षिका चित्रा मोहन सेवानिवृत्त हो गईं। अकादमी में पूर्णकालिक प्रशिक्षक के तीन पद पहले से ही रिक्त चल रहे हैं। इधर, मंत्री जी के निर्देश पर अकादमी प्रबंधन ने नए सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया शुरू कर दी। विज्ञापन भी आ गया। दाखिले की अंतिम तारीख भी तय हो गई। अब सवाल ये है कि जब अकादमी में कोई पूर्णकालिक प्रशिक्षक है ही नहीं, तो रंगकर्म के विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देगा कौन? अब आप ही बताइए नाट्य अकादमी के साथ इससे बड़ा नाटक कोई और हो सकता है क्या!

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साज़ को सोज़ मत बनाइए

लाइट, कैमरा और एक्शन… ये काेरोना काल है, इतने भर से ही काम नहीं चलता। कलाकार को बड़ी स्क्रीन, कंप्यूटर, लाइट, माइक, कैमरा और नेट कनेक्टिविटी के साथ भी सामंजस्य बैठाना पड़ रहा। एक संस्था के बैनर तले हाल ही में संगीत की ऑनलाइन क्लासेज के लिए ये सारा प्रबंध किया गया। स्वघोषित डंका भी बजा कि संगीत के लिए हमसे बेहतर ऑनलाइन प्रयास और कोई नहीं कर रहा। अब कलाकार तो कलाकार ठहरे। संगीत के लिए समर्पण की बात थी, खुद को कम कैसे आंकते। गुरुजी ने सवाल उठाया कि अगर संस्था की ओर से इतना ही बेहतर प्रयास हो रहा तो हमें क्यों नहीं दिख रहा। ये कैसा ऑनलाइन मंच है, जो किसी को नजर नहीं आ रहा। इन सवालों में दम तो था, मगर हमने गुरुजी को समझाया, संगीत तो दिल का साज़ है, इसे सोज़ मत बनाइए। कहने वाले को कहने दीजिए, आप अपनी करते जाइए।

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आप संगीत विदुषी हैं, ये तो शाश्वत सत्य है ही

जीवन का वो पड़ाव जब अमूमन हर कोई थक कर बैठ जाता है। आराम करता है, प्रभु नाम जपता है। वो भी उम्र के इसी दौर से गुजर रहीं, पर अंदाज जुदा है। खुद को सुपर सीनियर का भी सीनियर कहती हैं। हमेशा रचनात्मक रहती हैं। जब भी उनसे बात करो, कोई न कोई गीत जरूर सुना देती हैं। हम हर बार हैरान रह जाते हैं कि वो आज भी कोकिल कंठी हैं। आवाज के साथ हम उनकी ऊर्जा के भी कायल हैं। वो भी हम पर खूब आशीष बरसाती हैं। वो अपने लिए संबोधन में सगीत विदुषी पर विशेष जोर देती हैं। चूक हो जाए तो बिगड़ती हैं। ये हमारे मनाने का हुनर है या हमारे लिए उनका लगाव कि वो हर बार मान जाती हैं। हम उनसे यही कहते हैं, आप संगीत विदुषी हैं, ये तो शाश्वत सत्य है। संबोधन में चूक से सत्य नहीं बदला करते।

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तीनों ने धोखा दिया, पर गुरु-शागिर्द नहीं डिगे

गुरुजी आपकी सक्रियता को सलाम। विपरीत परिस्थितियों में भी आपने ऑनलाइन नृत्य समारोह आयोजित करके साबित कर दिया कि एक संगीत ही है, जिससे सकारात्मकता का संचार किया जा सकता है। संगीत के अथाह सागर में गोते लगाकर सृजनशील रहा जा सकता है। आपके प्रयास को शिष्यों का भी खूब साथ मिला। दिनभर रियाज चला। सोशल मीडिया पर रिहर्सल के वीडियो ने भी धूम मचाया। हर संगीत प्रेमी की तरह हम भी कार्यक्रम देखने के लिए शाम के तय समय का इंतजार करने लगे। मगर ये क्या! आधे घंटे से ज्यादा हो गया, पर कार्यक्रम तो शुरू ही नहीं हुआ। हमने गुरुजी को फोन किया, वो बोले- एक साथ तीनों ने धोखा दे दिया। झमाझम बारिश हो रही, बिजली भी गुल है और नेट कनेक्टिविटी भी नहीं। गुरु और शागिर्द नहीं डिगे। करीब दो घंटे बाद कार्यक्रम शुरू हुआ। हर कोई कमाल की प्रस्तुतियों को बस देखता ही रहा।

(दुर्गा शर्मा, दैनिक जागरण, लखनऊ।)

साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

हा हा दुर्दशा देखी न जाई!

भारतेंदु हरिश्चंद्र कृत नाटक भारत दुर्दशा में उन्होंने प्रतीकों के जरिए भारत की तत्कालीन स्थिति का चित्रण किया था। भारतेंदु जी ने भारत की दुर्दशा पर रोने और फिर इस दुर्दशा का अंत करने का आहवान किया। तब क्या मालूम था, भविष्य में उनके नाम पर बने संस्थान की दुर्दशा पर रोना आएगा। कम से कम उन लोगों को तो पीड़ा है ही जो संस्थान की नींव के पत्थर रहे हैं। संस्थान की दुर्गति के पीछे प्रमोशन के लिए सरकारी तंत्र की जुगाड़ व्यवस्था को भी दोषी माना जा रहा। किसी को प्रमुख पद पर सिर्फ इसलिए बैठा दिया जाता है, क्योंकि उसके शासन तक मजबूत तार जुड़े हैं। दलील ये भी दी गई कि वो संस्थान में कई वर्षों से कार्यरत हैं। उनसे वरिष्ठ और कोई नहीं। अब ये कौन सोचे कि अकाउंट की फाइलों के साथ उलझने वाला शख्स रंगमंच की दुनिया को कैसे संवारेगा?

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चेहरा क्या देखते हो

अपनी गायिका मैडम की हाजिरजवाबी लाजवाब है। भाव कोई भी हों, वो लय में ही रहती हैं। सुरों को उन्होंने साधा है, पर ये मुई जुबान काबू में ही नहीं रहती। चलती है तो बस चलती ही जाती है। बात चेहरे पर आ जाए तो कयामत ही समझो। एक किस्सा सुनाते हैं। यूं तो मैडम फेसबुक पर सुरों की महफिल सजाती हैं, पर उस दिन जूम एप पर चर्चा के लिए अामंत्रण आ गया। मैडम ने हां कर दिया। यहां तक तो सब ठीक था, पर चर्चा खत्म होने के बाद कहर बरपा हो गया। किसी ने मैडम से कह दिया कि लाइव सेशन में आपका चेहरा बहुत अजीब लग रहा था। मैडम ने भी तुरंत सुरमयी जवाब दिया, हमारा चेहरा क्या देखते हो, अाप भी लाइव आकर अपना चेहरा देखो ना। जवाब तो दे दिया, पर तब से मैडम जूम एप पर लाइव नहीं आईं हैं।

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आपका किस्सा था, हमारी कहानी है

दो दिन पहले की ही बात है, उन्होंने बताया था कि एकदम नये विषय पर कहानी लिख रहा। तीसरे दिन हमने पूछा, कहानी कहां तक पहुंची? जवाब मिला, अरे! वो तो पूरी होकर एक पत्रिका में प्रकाशित भी हो गई। सोशल मीडिया पर भी शेयर किया था। आपने नहीं पढ़ा? हमने कहा, नहींं! हम नहीं देख सके। वो बोले, अभी वाट्सएप करता हूं। इस बार कुछ अलग लिखने का प्रयास किया है, पढ़कर बताइएगा। इधर कॉल कट की, उधर वाट्सएप पर उनकी नयी कहानी का पीडीएफ आ गया। हमने पढ़ना शुरू किया, ये तो उसी किस्से पर आधारित कहानी है जो हमने उन्हें सुनाया था। थोड़ी देर बाद उनका मैसेज आया, कैसी लगी कहानी? हमने आश्चर्य जताया, ये तो हमारा बताया हुआ किस्सा था। उनका उत्तर आया, आपका किस्सा था, हमारी कहानी है। उनकी इस बात ने हमें निरुत्तर कर दिया, हम आज भी निरुत्तर ही हैं।

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मैडम जो ‘ टिक-टॉक ‘ चलती हैं, इस पर भी बैन लगेगा क्या

यूं तो मैडम का नृत्य से लगाव भी कम नहीं, पर उनके हाई हील्स प्रेम की चर्चा ज्यादा रहती है। अनलॉक वन में जिंदगी पटरी पर आना शुरू हुई तो मैडम ने भी सांस्कृतिक संध्या आयोजित करने का मन बनाया। इसके लिए लोगों से मुलाकात का सिलसिला शुरू हुआ। इसी के साथ फिर सुनायी देने लगी मैडम की हाई हील्स की टिक-टॉक आवाज। हमें लगा था लॉकडाउन में घर पर रहकर लोगों की कई आदतें बदल गईं तो मैडम में भी कुछ बदलाव आया होगा, पर जो बदल जाए वो अपनी मैडम कहां। मैडम का हाई हील्स प्रेम जस का तस रहा। उन्होंने ऑनलाइन सांस्कृतिक संध्या आयोजित की और हाई हील्स के साथ संचालन भी किया। वहीं, इधर टिकटॉक पर बैन के बाद कला रसिकों को ये जानने की भी इच्छा जागी है कि ये जो मैडम ‘ टिक-टॉक , टिक-टॉक ‘ चलती हैं, इस पर भी कोई प्रतिबंध लगेगा क्या?

(दुर्गा शर्मा)

दैनिक जागरण

लखनऊ

#कलमकारी

पंडित अर्जुन मिश्रा जयंती : एक जुलाई

लखनऊ को कर्मभूमि बनाकर करते रहे कथक साधना

– पंडित बिरजू महाराज की विरासत को आगे बढ़ाने आए थे लखनऊ

– देश-दुनिया में लखनवी कथक को दिलाई नयी पहचान

अमूमन कलाकार कला को अपनाता है, वहीं कुछ अद्भुत व्यक्तित्व ऐसे भी होते हैं, जिन्हें कला अपना बना लेती है। इसके लिए कला के प्रति समर्पण चाहिए होता है। पंडित अर्जुन मिश्रा कथक के लिए पूर्ण समर्पित थे। बनारस के सांगीतिक परिवार में जन्म हुआ। उस समय घर पर तमाम उस्तादों का आना होता था। गीत-संगीत की महफिल सजती थी। सुबह-शाम रियाज होता था। कथक सम्राज्ञी सितारा देवी की बड़ी बहन अलखनंदा देवी से चार साल की उम्र में उनकी नृत्य शिक्षा शुरू हुई। कथककार राम नारायण मिश्र की नजर थिरकते हुए बालक पर पड़ी। उन्होंने बालक को गोद लेने की इच्छा जाहिर की और पिता ने अपने बेटे को उन्हें सौंप दिया। राम नारायण मिश्र ने उन्हें धर्मपुत्र बना लिया और अपने साथ कोलकाता ले गए। वो कथक के जयपुर और लखनऊ घराने के मर्मज्ञ थे। पंडित अर्जुन मिश्रा 16 वर्ष तक उनसे सीखते रहे। गुरु के देहांत के बाद दिल्ली आ गए। जहां उन्होंने बिरजू महाराज से कथक सीखा। फिर अहमदाबाद भी गए, जहां कथक विदुषी कुमुदिनी लाखिया के सेंटर में शिक्षक हुए। पंडित अर्जुन मिश्रा के नृत्य में लखनऊ और जयपुर घराने के कथक का मिश्रण बखूबी नजर आता। वहीं, बनारस का होने के नाते उसका पुट भी रहता।

ये वर्ष 1992 की बात है। उस समय बिरजू महाराज जी के मन में हमेशा ये बात आती कि उनकी जन्मस्थली लखनऊ में कथक के प्रचार प्रसार के लिए वो कुछ भी नहीं कर पा रहे। चूंकि महाराज जी की पहले की पीढ़ी यहीं लखनऊ में ही थी और बिरजू महाराज दिल्ली शिफ्ट हो गए थे, इसलिए वो चाहते थे कि कोई योग्य व्यक्ति लखनऊ में उनकी विरासत को आगे बढ़ाए। इस काम के लिए उन्होंने अपने शिष्य पंडित अर्जुन मिश्रा को चुना। महाराज जी ने उनसे कहा कि लखनऊ जाकर वहां कथक की परंपरा को आगे बढ़ाओ। पंडित अर्जुन मिश्रा लखनऊ आ गए। कथक केंद्र में वरिष्ठ गुरु के पद पर अपनी जिम्मेदारी संभाली। तब से लखनऊ ही उनकी कर्मभूमि बन गई। इन्होंने कथक की नई पौध तैयार की। हर फेस्टिवल में लखनवी कथक नाम बनाने लगा। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नृत्य समारोहों में इनके शिष्य जीतने लगे। लखनऊ के कथक को विदेश तक पहुंचाया। इटली, यूरोप टूर किए। यूएसए भी गए। करीब आठ साल कथक केंद्र में सेवा देने के बाद निशातगंज में अपनी खुद की कथक अकादमी शुरू की। आज यही अकादमी पंडित अर्जुन मिश्रा जी की ड्योढ़ी के रूप में जानी जाती है। 2011 में पता चला कि पंडित अर्जुन मिश्रा को बोन कैंसर है। इसके बाद भी वो कथक साधना में लीन रहे और 2015 में हम सबसे विदा ले ली।

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कथक में नव प्रयोग

कथक में बैले शुरू किया। सोच को कथक के जरिए मंच पर साकार किया। देश भक्ति बैले भी बनाए। अद्भुत नृत्य नाटिकाएं बनाईं। कथक को प्रकृति से भी जोड़ा, नृत्य के जरिए उसका चित्रण किया। तानसेन के तरानों के साथ ही कवियों की संरचनाओं पर नृत्य किया। सूफी कथक की शुरुआत का श्रेय भी आपको ही जाता है।

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शिष्य आगे बढ़ा रहे परंपरा

पंडित अर्जुन मिश्रा के पुत्र पंडित अनुज मिश्रा पिता के नृत्य संस्कार की थाती को बखूबी संभाले हैं। पत्नी नेहा भी इसमें भागीदार हैं। बेटी कांतिका, स्मृति और जागृति भी इस परंपरा के वाहक बने हैं। कथक गुरु मनीषा मिश्रा पंडित अर्जुन मिश्रा की पहली गंडाबंद शार्गिद रही हैं। इटली से रुजैला, सूफी कथक का बड़ा नाम मंजरी चतुर्वेदी, संजुक्ता सिन्हा, गुंजन खरे, अर्पणा शर्मा, मिथिलेस, विकास पांडेय, आकांक्षा, सुरभि सिंह, पंडित शंभू महाराज की नातीन एकता और अंकिता आदि भी गुरु की इस नृत्य यात्रा को आज भी कायम रखे हैं।

((दुर्गा शर्मा))

दैनिक जागरण

लखनऊ।

कथकाचार्य स्व. पंडित अर्जुन मिश्रा
https://www.jagran.com/uttar-pradesh/lucknow-city-pandit-arjun-mishra-birth-anniversary-celebrated-today-in-lucknow-jagran-special-20459881.html

कॉलम : कलाकारी

https://www.jagran.com/uttar-pradesh/lucknow-city-dainik-jagran-column-story-about-short-film-artists-20439879.html
देखते हैं…बात कितनी दूर तलक जाएगी

कलाकार देश की संस्कृति काे बचाकर रखते हैं। जहां की संस्कृति जितनी सशक्त होगी, वो देश उतना ही मजबूत बनेगा। सवाल ये है कि संस्कृति सशक्त कैसे होगी? आर्थिक संकट की मार झेल रहे भूखे कलाकारों से? विड़बना है कि कला के लिए पूरी जिंदगी खपा देने वाले को अंत में महज दो हजार रुपये पेंशन मिलती है। कुछ को तो वो भी नसीब नहीं। संस्कृति विभाग के चक्कर लगाते-लगाते कुछ की सांसाें की डोर तक टूट जाती है। भ्रष्टाचार का दीमक कला संस्कृति को खोखला कर रहा। आखिर किसी को तो चुप्पी तोड़नी होगी। सुखद है कि चुप्पी टूटी, वो भी ऐसे समय में जब कलाकारों की पीड़ा को समझा जाना बेहद जरूरी है। वरिष्ठ रंगकर्मी संगम बहुगुणा ने शॉर्ट फिल्म बनाकर कला जगत में भ्रष्टाचार पर बेबाकी से बात की है। अब देखना ये है कि बात निकली है तो कितनी दूर तलक जाएगी, क्या असर दिखाएगी।

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राग कोरोना बंद कीजिए

कोरोना से डरने की नहीं, सतर्क रहकर लड़ने की जरूरत है। वो ये बात समझते भी हैं और सतर्क भी खूब रहते हैं। बावजूद इसके काेरोना है कि उनका पीछा ही नहीं छोड़ रहा। तरह-तरह की शक्लें बनाकर सपने में भी डरा रहा । एक रोज उन्होंने हमसे भी पूछ लिया, क्या आपको भी सपने में कोरोना नजर आ रहा? हमने कहा, बिल्कुल नहीं! मगर ऐसा सवाल क्यों? उन्होंने कोरोना से खाैफ की अपनी पूरी कहानी सुना दी। हमने पूछा कोरोना से डरने के अलावा आजकल आप क्या कर रहे? वो बोले, कोरोना गीत लिखने के साथ ही उन्हें गा भी रहा। कोरोना गीतों की रिकॉर्डिंग भी चल रही। इतना भर सुनना था कि हमें कोरोना से डर की उनकी बीमारी का इलाज मिल गया। हमने सलाह दी, कुछ दिन सुबह-शाम राग कोरोना गाना बंद कीजिए। अब वो हमें धन्यवाद कहते हुए चैन की नींद सोते हैं।

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काश! ताली वाले इमोजी में साउंड इफेक्ट जाए

किसी भी मंचीय प्रस्तुति की सफलता का एकमात्र पैमाना होता है, वो है तालियों की गूंज। तालियों से कलाकार का हौसला बढ़ता है, माहौल में जीवंतता आती है। ये तालियां ही तो होती हैं, जो कलाकार के कद को बढ़ाती हैं। कोरोना काल में कलाकार और प्रस्तुति तो वही हैं, बस मंच बदल गया। बदले मंच के साथ ही तालियों की आवाज भी कहीं गुम हो गई। हर दूसरे दिन ऑनलाइन प्रस्तुतियां हो रहीं। देखने वालों की भी कोई कमी नहीं। लाइक और कमेंट भी मिल रहे, फिर भी कलाकार संतुष्ट नहीं। इसी असंतोष के साथ एक रोज नृत्यांगना मैडम ने हमसे कहा, ऑनलाइन मंच पर दर्शकों की कोई कमी नहीं, विदेश तक भी कलाकार का हुनर पहुंच रहा। खल रही है तो बस तालियों की कमी। हमने पूछा, ताली बजाने वाले इमोजी से काम चलेगा? वो खिलखिलाकर बोलीं, उसमें साउंड इफेक्ट जाए तो बढ़िया रहेगा।
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मैडम की सोच कमाल, बना रहे ये पवित्र रिश्ता

एक रोज हम हिंदी सेवा में लीन संस्था के कार्यालय गए। प्रकाशन कक्ष में बैठे थे। दिन भर किताब और पत्र लेकर लोग आते जाते रहते। किताब या पत्र लेने से पहले मैडम अपने मातहत से पूछतीं इसका पवित्र रिश्ता कायम हुआ या नहीं। जवाब मिलता जी! हो गया है। उसके बाद वो पत्र और किताब को अपनी सुपुर्दगी में लेतीं। दिन भर यही क्रम चलता। आखिर में हमने पूछ ही लिया ये पवित्र रिश्ता क्या है? तो महोदया ने बताया पवित्र रिश्ता मतलब सैनिटाइजेशन। सतर्कता के साथ संवेदनशीलता भी जरूरी है। कई बार लोग सैनिटाइजेशन के नाम पर आहत हो जाते हैं। वो सोचते हैं कि उन्हें काेरोना संदिग्ध मानकर व्यवहार हो रहा, तो हमने ये कोड वर्ड बना लिया। सतर्कता के साथ काम भी कर लेते हैं और किसी की भावनाएं भी आहत नहीं होतीं। मैडम की सोच हमें जंच गई। हमने कहा, बना रहे ये पवित्र रिश्ता।

#कलाकारी #कलमकारी

@दुर्गा शर्मा

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