पंडित अर्जुन मिश्रा जयंती : एक जुलाई

लखनऊ को कर्मभूमि बनाकर करते रहे कथक साधना

– पंडित बिरजू महाराज की विरासत को आगे बढ़ाने आए थे लखनऊ

– देश-दुनिया में लखनवी कथक को दिलाई नयी पहचान

अमूमन कलाकार कला को अपनाता है, वहीं कुछ अद्भुत व्यक्तित्व ऐसे भी होते हैं, जिन्हें कला अपना बना लेती है। इसके लिए कला के प्रति समर्पण चाहिए होता है। पंडित अर्जुन मिश्रा कथक के लिए पूर्ण समर्पित थे। बनारस के सांगीतिक परिवार में जन्म हुआ। उस समय घर पर तमाम उस्तादों का आना होता था। गीत-संगीत की महफिल सजती थी। सुबह-शाम रियाज होता था। कथक सम्राज्ञी सितारा देवी की बड़ी बहन अलखनंदा देवी से चार साल की उम्र में उनकी नृत्य शिक्षा शुरू हुई। कथककार राम नारायण मिश्र की नजर थिरकते हुए बालक पर पड़ी। उन्होंने बालक को गोद लेने की इच्छा जाहिर की और पिता ने अपने बेटे को उन्हें सौंप दिया। राम नारायण मिश्र ने उन्हें धर्मपुत्र बना लिया और अपने साथ कोलकाता ले गए। वो कथक के जयपुर और लखनऊ घराने के मर्मज्ञ थे। पंडित अर्जुन मिश्रा 16 वर्ष तक उनसे सीखते रहे। गुरु के देहांत के बाद दिल्ली आ गए। जहां उन्होंने बिरजू महाराज से कथक सीखा। फिर अहमदाबाद भी गए, जहां कथक विदुषी कुमुदिनी लाखिया के सेंटर में शिक्षक हुए। पंडित अर्जुन मिश्रा के नृत्य में लखनऊ और जयपुर घराने के कथक का मिश्रण बखूबी नजर आता। वहीं, बनारस का होने के नाते उसका पुट भी रहता।

ये वर्ष 1992 की बात है। उस समय बिरजू महाराज जी के मन में हमेशा ये बात आती कि उनकी जन्मस्थली लखनऊ में कथक के प्रचार प्रसार के लिए वो कुछ भी नहीं कर पा रहे। चूंकि महाराज जी की पहले की पीढ़ी यहीं लखनऊ में ही थी और बिरजू महाराज दिल्ली शिफ्ट हो गए थे, इसलिए वो चाहते थे कि कोई योग्य व्यक्ति लखनऊ में उनकी विरासत को आगे बढ़ाए। इस काम के लिए उन्होंने अपने शिष्य पंडित अर्जुन मिश्रा को चुना। महाराज जी ने उनसे कहा कि लखनऊ जाकर वहां कथक की परंपरा को आगे बढ़ाओ। पंडित अर्जुन मिश्रा लखनऊ आ गए। कथक केंद्र में वरिष्ठ गुरु के पद पर अपनी जिम्मेदारी संभाली। तब से लखनऊ ही उनकी कर्मभूमि बन गई। इन्होंने कथक की नई पौध तैयार की। हर फेस्टिवल में लखनवी कथक नाम बनाने लगा। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नृत्य समारोहों में इनके शिष्य जीतने लगे। लखनऊ के कथक को विदेश तक पहुंचाया। इटली, यूरोप टूर किए। यूएसए भी गए। करीब आठ साल कथक केंद्र में सेवा देने के बाद निशातगंज में अपनी खुद की कथक अकादमी शुरू की। आज यही अकादमी पंडित अर्जुन मिश्रा जी की ड्योढ़ी के रूप में जानी जाती है। 2011 में पता चला कि पंडित अर्जुन मिश्रा को बोन कैंसर है। इसके बाद भी वो कथक साधना में लीन रहे और 2015 में हम सबसे विदा ले ली।

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कथक में नव प्रयोग

कथक में बैले शुरू किया। सोच को कथक के जरिए मंच पर साकार किया। देश भक्ति बैले भी बनाए। अद्भुत नृत्य नाटिकाएं बनाईं। कथक को प्रकृति से भी जोड़ा, नृत्य के जरिए उसका चित्रण किया। तानसेन के तरानों के साथ ही कवियों की संरचनाओं पर नृत्य किया। सूफी कथक की शुरुआत का श्रेय भी आपको ही जाता है।

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शिष्य आगे बढ़ा रहे परंपरा

पंडित अर्जुन मिश्रा के पुत्र पंडित अनुज मिश्रा पिता के नृत्य संस्कार की थाती को बखूबी संभाले हैं। पत्नी नेहा भी इसमें भागीदार हैं। बेटी कांतिका, स्मृति और जागृति भी इस परंपरा के वाहक बने हैं। कथक गुरु मनीषा मिश्रा पंडित अर्जुन मिश्रा की पहली गंडाबंद शार्गिद रही हैं। इटली से रुजैला, सूफी कथक का बड़ा नाम मंजरी चतुर्वेदी, संजुक्ता सिन्हा, गुंजन खरे, अर्पणा शर्मा, मिथिलेस, विकास पांडेय, आकांक्षा, सुरभि सिंह, पंडित शंभू महाराज की नातीन एकता और अंकिता आदि भी गुरु की इस नृत्य यात्रा को आज भी कायम रखे हैं।

((दुर्गा शर्मा))

दैनिक जागरण

लखनऊ।

कथकाचार्य स्व. पंडित अर्जुन मिश्रा
https://www.jagran.com/uttar-pradesh/lucknow-city-pandit-arjun-mishra-birth-anniversary-celebrated-today-in-lucknow-jagran-special-20459881.html

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