साप्ताहिक कॉलम : कलाकारी

हा हा दुर्दशा देखी न जाई!

भारतेंदु हरिश्चंद्र कृत नाटक भारत दुर्दशा में उन्होंने प्रतीकों के जरिए भारत की तत्कालीन स्थिति का चित्रण किया था। भारतेंदु जी ने भारत की दुर्दशा पर रोने और फिर इस दुर्दशा का अंत करने का आहवान किया। तब क्या मालूम था, भविष्य में उनके नाम पर बने संस्थान की दुर्दशा पर रोना आएगा। कम से कम उन लोगों को तो पीड़ा है ही जो संस्थान की नींव के पत्थर रहे हैं। संस्थान की दुर्गति के पीछे प्रमोशन के लिए सरकारी तंत्र की जुगाड़ व्यवस्था को भी दोषी माना जा रहा। किसी को प्रमुख पद पर सिर्फ इसलिए बैठा दिया जाता है, क्योंकि उसके शासन तक मजबूत तार जुड़े हैं। दलील ये भी दी गई कि वो संस्थान में कई वर्षों से कार्यरत हैं। उनसे वरिष्ठ और कोई नहीं। अब ये कौन सोचे कि अकाउंट की फाइलों के साथ उलझने वाला शख्स रंगमंच की दुनिया को कैसे संवारेगा?

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चेहरा क्या देखते हो

अपनी गायिका मैडम की हाजिरजवाबी लाजवाब है। भाव कोई भी हों, वो लय में ही रहती हैं। सुरों को उन्होंने साधा है, पर ये मुई जुबान काबू में ही नहीं रहती। चलती है तो बस चलती ही जाती है। बात चेहरे पर आ जाए तो कयामत ही समझो। एक किस्सा सुनाते हैं। यूं तो मैडम फेसबुक पर सुरों की महफिल सजाती हैं, पर उस दिन जूम एप पर चर्चा के लिए अामंत्रण आ गया। मैडम ने हां कर दिया। यहां तक तो सब ठीक था, पर चर्चा खत्म होने के बाद कहर बरपा हो गया। किसी ने मैडम से कह दिया कि लाइव सेशन में आपका चेहरा बहुत अजीब लग रहा था। मैडम ने भी तुरंत सुरमयी जवाब दिया, हमारा चेहरा क्या देखते हो, अाप भी लाइव आकर अपना चेहरा देखो ना। जवाब तो दे दिया, पर तब से मैडम जूम एप पर लाइव नहीं आईं हैं।

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आपका किस्सा था, हमारी कहानी है

दो दिन पहले की ही बात है, उन्होंने बताया था कि एकदम नये विषय पर कहानी लिख रहा। तीसरे दिन हमने पूछा, कहानी कहां तक पहुंची? जवाब मिला, अरे! वो तो पूरी होकर एक पत्रिका में प्रकाशित भी हो गई। सोशल मीडिया पर भी शेयर किया था। आपने नहीं पढ़ा? हमने कहा, नहींं! हम नहीं देख सके। वो बोले, अभी वाट्सएप करता हूं। इस बार कुछ अलग लिखने का प्रयास किया है, पढ़कर बताइएगा। इधर कॉल कट की, उधर वाट्सएप पर उनकी नयी कहानी का पीडीएफ आ गया। हमने पढ़ना शुरू किया, ये तो उसी किस्से पर आधारित कहानी है जो हमने उन्हें सुनाया था। थोड़ी देर बाद उनका मैसेज आया, कैसी लगी कहानी? हमने आश्चर्य जताया, ये तो हमारा बताया हुआ किस्सा था। उनका उत्तर आया, आपका किस्सा था, हमारी कहानी है। उनकी इस बात ने हमें निरुत्तर कर दिया, हम आज भी निरुत्तर ही हैं।

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मैडम जो ‘ टिक-टॉक ‘ चलती हैं, इस पर भी बैन लगेगा क्या

यूं तो मैडम का नृत्य से लगाव भी कम नहीं, पर उनके हाई हील्स प्रेम की चर्चा ज्यादा रहती है। अनलॉक वन में जिंदगी पटरी पर आना शुरू हुई तो मैडम ने भी सांस्कृतिक संध्या आयोजित करने का मन बनाया। इसके लिए लोगों से मुलाकात का सिलसिला शुरू हुआ। इसी के साथ फिर सुनायी देने लगी मैडम की हाई हील्स की टिक-टॉक आवाज। हमें लगा था लॉकडाउन में घर पर रहकर लोगों की कई आदतें बदल गईं तो मैडम में भी कुछ बदलाव आया होगा, पर जो बदल जाए वो अपनी मैडम कहां। मैडम का हाई हील्स प्रेम जस का तस रहा। उन्होंने ऑनलाइन सांस्कृतिक संध्या आयोजित की और हाई हील्स के साथ संचालन भी किया। वहीं, इधर टिकटॉक पर बैन के बाद कला रसिकों को ये जानने की भी इच्छा जागी है कि ये जो मैडम ‘ टिक-टॉक , टिक-टॉक ‘ चलती हैं, इस पर भी कोई प्रतिबंध लगेगा क्या?

(दुर्गा शर्मा)

दैनिक जागरण

लखनऊ

#कलमकारी

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